कुछ रोग ऐसे हैं जो मुख्य रूप से बुद्धि से जुड़े हुए हैं। सिद्धियाँ आकर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं। बुद्धि लोभ का अधिष्ठान है। साधक जब साधना पथ पर अग्रसर होता है, तो सिद्धियाँ आकर लोभ दिखाती हैं। अब साधक के सामने समस्या है कि वह चमत्कारों को स्वीकार करे या न करें। अधिकांश साधक तो स्वीकार कर लेते हैं और उनकी साधना में प्रगति रुक जाती है और उस प्रलोभन से बुद्धि जब रोगग्रस्त हो जाती है, तब हम अपने को क्या कहकर भुलावा देते हैं ? यह कि हम सिद्धियों का दुरुपयोग थोड़े ही करेंगे, अच्छे कामों में लगायेंगे और इसका परिणाम क्या होता है ? लोककल्याण और आत्मप्रदर्शन ऐसा कुछ घुल-मिल जाता है कि साधक की बुद्धि बड़ी सरलता से उसके प्रलोभन में आ जाती है, पर अगर बुद्धि सयानी हुई तो साधक उनकी ओर आँखें उठाकर भी नहीं देखता। जानता है कि इसमें मेरा हित नहीं है। साधक की सफलता इसी में है कि कितनी भी बढ़िया बात क्यों न हो, कितनी भी बुद्धिसंगत बात क्यों न हो, उन सिद्धियों को, उन चमत्कारों को साधक अस्वीकार कर दे। यही संकेत उत्तरकाण्ड में ज्ञानदीपक प्रसंग में किया गया है।
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