Sunday, 15 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भगवान शंकर त्रिभुवन गुरु हैं। वैद्य हैं। वे विष को भी अमृत बना देते हैं, पर विडम्बना तो यह है कि योग्य से योग्य वैद्य प्राप्त होने मात्र से क्या रोगी स्वथ्य हो जाता है ? भगवान शंकर के समान महान वैद्य के प्रयास करने पर भी कुछ ऐसे रोगी हैं, जो स्वथ्य नहीं हुए। सती और नारद के ह्रदय में संशय यह बताने के लिए हुआ कि यदि कोई महान गुरु, एक महान वैद्य या डॉक्टर को पा ले, तो मात्र इतने से ही रोगी स्वथ्य हो जायेगा यह मानना ठीक नहीं है। उसके साथ कुछ बातें जीवन से जुड़ी हुई हैं, जो जीवन में ठीक-ठीक आनी चाहिए, तब कहीं जाकर रोग दूर होता है, स्वथ्यता आती है। पहली बात तो यह है कि रोगी अपने रोग का अनुभव कर रहा है या नहीं ? अगर रोगी अपने को रोगी अनुभव करता है, तो वैद्य के पास जायेगा। वैद्य जो औषध और पथ्य बतायेंगे, उनका वह सेवन करेगा, अनुकूल आचरण करेगा तब जाकर स्वस्थ होगा।

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