Saturday, 7 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

लोभ का सीधा संबंध बुद्धि से है और यह निश्चित है कि जिस विकार का संबंध बुद्धि से होगा, वह बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न करेगा। इसे यों समझ लीजिए कि अगर किसी के शरीर में रोग हो जाय और वह उस रोग को जानकर, अपने को रोगी मानकर चिकित्सक के पास जाय, औषध ले और स्वस्थ होने की चेष्टा करे, तब तो कोई समस्या नहीं है, पर यदि कोई रोगी होने पर भी रोग का अनुभव न करे, अपने को रोगी न माने तो ? और मन के संदर्भ में यही सत्य है। मन में विकार आने पर, मन के रोगी होने पर यदि हमारी बुद्धि स्वथ्य बनी रहे, बुद्धि में ठीक-ठीक यह अनुभव होता रहे कि हमारे मन में विकार है, यह रोग हो गया है, तब तो हम उस रोग से निवृत्ति की चेष्टा करेंगे, पर कहीं ऐसा हो कि मन के रोगों को बुद्धि का समर्थन प्राप्त हो जाय और बुद्धि यह कहने लगे कि यह रोग नहीं, यह तो स्वथ्यता का लक्षण है, तो ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से वह रोग दूर होने के स्थान पर अचल होकर बैठ जायेगा। चाहे वह काम हो, क्रोध हो या लोभ ; जब भी हम उस विकार का बुद्धि के द्वारा समर्थन करेंगे, तर्क-युक्ति से उसका पक्ष लेंगे, तो निश्चित रूप से उस रोग को दूर करना असंभव हो जायेगा।

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