लोभ और ईर्ष्या दोनों का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। दूसरों का सुख देखकर जलने की वृत्ति मुख्यतः लोभ से जुड़ी हुई है। इस वृत्ति के दृष्टांत के रूप में मानस में इस रोग से ग्रस्त मंथरा को प्रस्तुत किया गया। यह वृत्ति मंथरा के चरित्र में दिखाई देती है। मंथरा महारानी कैकेयी की प्रियसेविका है, कैकयनरेश की कृपापात्र है, पर इतना होते हुए भी लोभ की वृत्ति उसके अन्तःकरण में दबी पड़ी है और उसका अतिरेक ईर्ष्या भी उसके चरित्र में दिखाई देता है। मंथरा नगर में घूमने निकली। नगर सजाया जा रहा था। उसने पूछा कि नगर क्यों सजाया जा रहा है ? तो समाचार मिला कि कल अयोध्या के राजसिंहासन पर श्रीराम का तिलक होने वाला है। श्रीराम का राजतिलक की बात सुनकर उसका ह्रदय जलने लगा। गोस्वामीजी ने कहा कि इस जलन की भी मात्रा होती है। अगर लोभ कफ हो और उस कफ से साधारण खाँसी आवे तो वह जल्दी ठीक हो सकती है, पर यदि खाँसी यक्ष्माजन्य हो, तब तो उसका ठीक होना बड़ा कठिन है और इस राजयक्ष्मा रोग से जुड़ा हुआ एक अन्य रोग है कोढ़। वैसे उनका आपसी संबंध समझ में नहीं आता, क्योंकि शरीर के संदर्भ में इस संबंध को कोई महत्व नहीं दिया जाता पर मन के संदर्भ में ये दोनों गहराई से जुड़े हुए हैं। मन की कुटिलता और दुष्टता ही मन का कोढ़ है और दूसरों के सुख को देखकर जलना ही उसका राजयक्ष्मा है।
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