आयुर्वेदशास्त्र में एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है, जिसमें कहा गया है कि संसार में ऐसा कोई वनस्पति या कोई पदार्थ नहीं है, जिससे कोई दवा न बने। आवश्यकता है तो उसमें छिपे हुए औषधीय गुण जानने की। नयी-नयी खोजें होती रहती हैं। आप अगणित वस्तुओं के बारे में सुनते रहते हैं कि इस वस्तु से एक नयी दवा निकल आयी। आज भी चिकित्सा-पद्धति में यह यह सुनने और पढ़ने को मिलता है कि फफूँद लगी हुई वस्तु में भी औषध का निर्माण हो गया है। फफूँद को हम विकृति मानते हैं, पर खोज की गयी तो पाया गया कि उस विकृति में भी औषधीय तत्व छिपा हुआ है। भगवान शंकर की सबसे बड़ी विलक्षणता यही है। वे गुरु हैं और गुरु का कार्य यही है कि वह शिष्य के गुणों का तो सदुपयोग करे ही, पर साथ ही उसके दोषों को भी गुणों में परिवर्तित कर दें। यही गुरु की विलक्षणता है और यही विलक्षणता शंकरजी में विद्यमान है।
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