आगे चलकर भगवान शंकर रावण के पास हनुमानजी के रूप में गये। शिष्य नहीं आया, तो स्वयं गुरु गये। शिष्य कैसा भी हो, करुणानिधान गुरु उसके हित के लिए अपनी प्रभुता त्याग कर, वानर शरीर धारण कर स्वयं पहुँच गये। भगवान श्रीराम का भी वही उद्देश्य था। वे भी युद्ध को टालना चाहते थे। चाहते थे कि रावण स्वथ्य हो जाय। बन्दरों में से किसी को भी लंका नहीं भेजा। वे सोच रहे थे कि दवा से ही अगर बीमारी ठीक हो जाय तो आगे नहीं बढ़ना चाहिए। चिकित्सा भी दो प्रकार की होती है। अगर दवा से बीमारी ठीक नहीं हुई, तो शल्य चिकित्सा करनी पड़ती है। इसलिए वे हनुमानजी को भेजकर पहले दवा वाली चिकित्सा कराना चाहते हैं। दवा से अगर रावण और लंका स्वथ्य हो जाय, तो अच्छा है। वे कहते हैं कि हनुमान ! तुम वैद्य बनकर जाओ, रावण स्वथ्य हो जाय, राज्य करे, प्रजा का पालन करे, सेवा करे, इससे बढ़कर अधिक प्रसन्नता मुझे और क्या होगी ?
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