रावण अपने को बड़ा बुद्धिमान समझता है। उसके मन में यह प्रश्न आया कि कहीं श्रीराम सचमुच ईश्वर तो नहीं हैं ? तब उसे लगता है कि क्या भगवान ने अवतार ले लिया है ? जब उसके मन यह प्रश्न आया, तो इसके समाधान का बड़ा सरल उपाय था। वह अपने गुरु शंकरजी के पास चला जाता और अपने सन्देह को उनके सामने रख देता। शंकरजी बता देते और समाधान हो जाता, पर रावण की समस्या क्या है ? वह अपने को भगवान शंकर से भी अधिक बुद्धिमान मानता है। उसका अपना गणित है - उनको मैंने गुरु बना लिया इसका अर्थ थोड़े ही हुआ कि वे मुझसे अधिक बुद्धिमान हैं। उनके तो पाँच (पंचानन) शिर हैं और मेरे दश। मेरे पास दुगुनी बुद्धि है। मुझे उनके पास जाने की क्या आवश्यकता है ? मैं जितना समझता हूँ, उतना वे क्या समझेंगे और मुझे क्या बतायेंगे ? मुझसे अधिक बुद्धिमान कोई है ही नहीं। यही रावण की समस्या है।
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