Wednesday, 11 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

श्री भरत जब भगवान राम के चरण की रेखाओं को देखते हैं, तो उनको ऐसा लगता है कि यह तो पारस है। जिस पारस के स्पर्श से जड़ अहिल्या चेतन हो गयी। तब उसमें पाप नष्ट होकर पवित्रता का संचार हो गया। यह तो परखा हुआ पारस है। श्री भरत इस पारस को अपने ह्रदय से, अपने शरीर से स्पर्श कराते हैं। आगे चलकर गोस्वामीजी ने कहा कि जब भरतजी चित्रकूट से लौटकर अयोध्या आये, तो वहाँ वे निरन्तर तपस्या करने लगे। लोगों ने पूछा कि महाराज ! आपको तपस्या की क्या आवश्यकता है ? तपस्या के समग्र फल के रूप में राम को तो आप पा ही चुके हैं। श्री भरत बोले कि मैं तो लोहा था, पर वे तो पारस हैं। उनके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है। मैं भी संभवतः उनके स्पर्श से सोना हो गया हूँ, पर बार-बार परखकर देखता रहता हूँ कि कहीं फिर से लोहा तो नहीं हो गया। इसमें भरतजी का संकेत यही है कि यह मन का लोहा एक बार सोना बनने के बाद पता नहीं कब फिर से लोहा बन जाय ! इसका कोई ठिकाना नहीं। यह मन इतनी तेजी से बदलता है कि निरन्तर सजग न रहने वाला व्यक्ति उसके द्वारा कभी भी छला जा सकता है। मन में एक बार सद्गुण और सद्भाव आ जाने पर भी निश्चिन्त होना ठीक नहीं है कि अब मेरा मन ठीक हो गया है, अब पतित नहीं होगा। इसलिए श्री भरत जीवनभर निरन्तर मन को कसकर देखते हैं, हर क्षण सावधान रहते हैं।

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