Friday, 13 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

भगवान शंकर सर्पों का आभूषण धारण करते हैं। आयुर्वेद में बहुत-सी औषधियाँ हैं, जो सर्प-विष के द्वारा बनायी जाती हैं। अब प्रश्न यह है कि सर्प मारक है या जीवन देने वाला ? तो अन्यत्र तो सर्प मारक है, पर भगवान शंकर के हाथ में वह मारक नहीं है। सर्प माने क्या ? विषधर। विष से मृत्यु हो जाती है। उस विषधर को भी वे अपना आभूषण बना लेते हैं और उससे भी आगे, यह जो समुद्र से निकला हुआ विष है, जिससे कि सारा संसार जल रहा है, उसे पीकर वे आनन्दविभोर हो गये। भगवान विष्णु क्या बताना चाहते हैं ? जो लोग अमृत पीकर अमर होना चाहते हैं, उसकी दृष्टि अपूर्ण है। जो विष पीकर अमृतत्व की सृष्टि करना चाहते हैं, उन्हीं की दृष्टि पूर्ण है।

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