Monday, 9 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

वर्णन आता है कि समुद्र मंथन से जो विष निकला, भगवान शंकर ने उस विष को पी लिया और वह विष उनके लिए अमृत के समान हो गया। विष अमृत हो गया इसका अभिप्राय क्या है ? यही उत्कृष्ट वैद्य की कसौटी है। साधारण विभाजन तो वनस्पतियों में भी है, वस्तुओं में भी है। जैसे हम कहेंगे कि दूध पौष्टिक पदार्थ है, दूध पीने पर व्यक्ति स्वथ्यता का अनुभव करता है और संखिया विष है, उसे खाने से मृत्यु हो जाती है। सामान्य व्यवहार में दोनों में प्रभेद है, एक ग्राह्य है और एक त्याज्य है, पर वैद्य की विशेषता क्या है ? एक ओर तो वे रोगी के लिए दूध का पथ्य देते हैं और दूसरी ओर संखिया तथा अन्य विषों का भस्म बनाकर, औषध बनाकर, उसकी मारकता को नष्टकर, उसमें जो अमृतत्व छिपा हुआ है, उसे प्रकट करते हैं। फिर उसे रोगी को औषध के रूप में देकर उसको स्वथ्य करते हैं। यह बड़ा तात्विक संकेत है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन में जिसे हम अच्छाई कहते हैं, उसमें तो अच्छाई है ही, लेकिन जिसे हम बुराई समझते हैं, उसमें भी अमृतत्व छिपा हुआ है। रामचरितमानस में मानस-रोगों के चिकित्सा के संदर्भ में वैद्य की बात कही गयी है, गोस्वामीजी कहते हैं - सद्गुरू ही वैद्य हैं। वैद्य जैसे शरीर के रोगों को दूर करते हैं वैसे ही सद्गुरू हमारे जीवन के विष को अमृत, अमंगल को मंगल और कुरुप को सुरुप बना देते हैं।

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