Friday, 27 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

गोस्वामीजी अपनी काव्यमयी भाषा में लिखते हैं कि जब किसी व्यक्ति को भीषण रोग हो जाता है और साधारण दवा से वह ठीक नहीं होता, तो उसे सोना-हीरा-मोती का भस्म बनाकर दिया जाता है। रावण का रोग भी असाध्य हो चुका है। उसे हीरे-मोती-सोने का भस्म देना होगा। लंका जलवाने के पीछे प्रभु का मानो संकेत था, हनुमानजी के लिए कि रावण के लिए भस्म लेने और कहाँ जाओगे। उसके चार सौ कोस की लंका में बहुत हीरा-मोती और सोना भरा पड़ा है। उसे ही फूँककर भस्म बनाओ और रावण को खिलाओ। शायद इससे वह ठीक हो जाय, किन्तु इतने प्रयत्नों के बाद भी रावण का रोग क्या दूर हुआ ? वही सूत्र कि रोगी अपने को रोगी ही न माने, वैद्य की बात न माने, दवा का सेवन न करे, तो वह स्वस्थ कैसे होगा ? रावण तो अपने को कभी रोगी मानता ही नहीं, उल्टे वैद्य की ही हँसी उड़ाता है। अब ऐसे रोगी को शंकरजी के समान श्रेष्ठतम वैद्य भी कैसे ठीक कर सकते हैं ?

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