Sunday, 22 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

.......कल से आगे .......
हनुमानजी बँधे हुए हैं, पर उस बंधन में भी कैसे अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं ? बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। हनुमानजी बँधे हुए हैं और रावण मुक्त है। संकेत क्या है ? जैसे कोई व्यक्ति कारागार में हो तो उसे देखकर लोग कहते हैं कि वह बन्दी है, लेकिन जो घरों में रहते हैं, उन्हें देखकर यह नहीं लगता कि वह बन्दी है। अब अगर कोई गहराई से देखे, तो पता चलेगा कि वास्तविक कैदी तो वे हैं, जो बंदी के रूप में नहीं दिखाई देते। क्यों ? क्योंकि जो लोग जेल में हैं उनका तो एक निश्चित समय है कि इतने समय के बाद वे जेल से मुक्त हो जायेंगे, लेकिन इस घर के जेल में जो लोग बँधे हुए हैं, इससे कब मुक्त होंगे ? इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है। यह तो बड़ी विडम्बना है। कैसा विरोधाभास है ? हनुमानजी यही तो बताना चाहते थे कि रावण जो मुक्त प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में कितना बँधा हुआ है और जिसने लोक कल्याण हेतु स्वेच्छा से बंधन स्वीकार किया है, वह तो नित्यमुक्त है चाहे तो क्षणभर में सारे बंधन उतारकर फेंक सकता है।

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