Monday, 16 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रोगी अपने को रोगी न माने, स्वथ्य माने, तब ? सती और रावण के जीवन की यही समस्या है कि उन्हें अपनी बुध्दिमता पर बड़ा अभिमान है। वे दक्ष की पुत्री हैं। दक्ष माने चतुर। चतुर की पुत्री होने के नाते उन्हें अपनी चतुराई का इतना अहंकार है कि भगवान शिव की बात भी उन्हें सही नहीं लगती। मानो वे अपने पति की बात को मानना तो चाहती है, पर उनकी बुद्धि उन्हें मानने की अनुमति नहीं देती। बड़ी विडम्बना है। इतने बड़े वैद्य की पत्नी ऐसे असाध्य रोग से ग्रस्त हो गयीं। तब भगवान शंकर को स्वीकार करना पड़ा कि केवल वैद्य ही सब कुछ नहीं होता, रोगी की भी कुछ विशेषताएँ होती हैं। क्या डॉक्टर या वैद्य के घर में कोई बीमार नहीं पड़ता ? यह तो संसार में दिखाई देता है। बड़े - बड़े महात्माऔं के सभी शिष्य क्या स्वथ्य हो जाते हैं ? सभी स्वस्थ नहीं हो पाते। कभी-कभी तो लोग आश्चर्य करते हैं कि इतने बड़े महात्मा के पास रहकर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और कभी-कभी तो दूसरों की कौन कहे, स्वयं वैद्य बीमार हो जाते हैं। लोग बड़े आश्चर्य से पूछते हैं कि अरे ! क्या आप बीमार पड़ गये ? अरे भई ! बीमारी तो ऐसी वस्तु है कि चाहे वैद्य हो या कोई भी हो, जो कुपथ्य करेगा, वह बीमार पड़ेगा। जब व्यक्ति को अपनी बुध्दिमता पर अभिमान हो जाता है, तब वह कुपथ्य कर बैठता है। यह समस्या दोनों की है, सती की और रावण की भी।

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