समुद्र मंथन से जब विष निकला, तब भगवान विष्णु ने कहा था कि इस विष को भगवान शंकर के पास ले जाओ और तब शंकरजी ने क्या किया ? शंकरजी को जब विष दिया गया और ज्यों ही उन्होंने उसे अपने मुँह में लिया, त्यों ही उनके मुख से निकला राम। लोगों ने पूछा कि महाराज ! यह विष के साथ आप राम क्यों जोड़ रहे हैं ? शंकरजी ने कहा कि भई ! विष के साथ राम को जोड़ देने से विश्राम बन जाता है। यह सबसे बढ़िया बात है। विष के साथ राम को जोड़कर उन्होंने उसे बना दिया- अखिल लोक दायक विश्रामा। नाम महिमा में यही कहा गया है - जो समस्त लोक के प्राणियों को विश्राम देने वाला है। भगवान शंकर का अभिप्राय क्या है ? विष में राम को मिला दीजिए तो विष भी विश्राम में परिणत हो जायेगा, लेकिन दुर्भाग्य की बात तो यह है कि ऐसे भी अभागे लोग हैं, जो विश्राम से राम को निकाल देते हैं और विश्राम को भी अपने जीवन में विष बना लेते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में विष को छोड़कर, दुःख एवं मृत्यु को छोड़कर और कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
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