गीता में काम के संबंध में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - इन्द्रिय, मन और बुद्धि - ये सब काम के निवास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को ढ़ँककर जीवात्मा को मोहित करता है। अभिप्राय यह है कि यदि मन और बुद्धि दोनों ही विकारग्रस्त हो जायँ, मन में काम आ जाय और बुद्धि उसका समर्थन करने लग जाय, तब उसको दूर करने का क्या उपाय है ? काम मुख्य रूप से मन से जुड़ा है और बुद्धि अगर उसे दोष या बुराई या रोग के रूप देख रही है, तो उसे दूर करने की चेष्टा करती है।
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