Wednesday, 18 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

दोष दो तरह के होते हैं - एक बाह्य और आन्तरिक। जैसे पीतल के बर्तन में खटाई लग जाय तो उसमें दोष आ जाता है, लेकिन एक दोष और होता है, जो बाहर नहीं भीतर ही होता है, बर्तन में ही दोष होता है। उसे धातुगत दोष कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि पीतल के लोटे को आप कितना ही माँजिए, इससे बाहरी दोष तो दूर हो जाता है, पर उसका धातुगत दोष अर्थात पीतल होने का दोष कभी दूर नहीं होता। अन्त में यह जो सतीजी का शरीरत्याग है, इसका अभिप्राय क्या है ? शंकरजी समझ गये कि सती के और दोषों को मिटाना संभव है, पर दक्षपुत्री के रूप में उनका जो मूल संस्कार है, उसे मिटाना संभव नहीं है। उन्हें तो धातु ही बदलनी पड़ेगी, तब जाकर इनका रोग दूर होगा।

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