Monday, 2 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

पहले तो मंथरा में लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति है। श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर उसका ह्रदय राजयक्ष्मा से जलने लगा, फिर उसके बाद उसके मन को कोढ़ भी हो गया। अगर मंथरा यह सोचकर शांत हो जाती कि राम को राज्य मिले या चाहे जिसको मिले, मुझे क्या लेना-देना है ! यह भी एक विवेक की बात होती और उसे ईर्ष्या हो ही गयी, तो मन में यह भी सोच लेती कि राम को राज्य मिल रहा है, बुरा तो लग रहा है, पर मैं कर ही क्या सकती हूँ ? इसे रोकना मेरे बस की बात नहीं है, तो भी बुराई आगे नहीं बढ़ पाती, परन्तु उस राजयक्ष्मा के साथ कोढ़ (कुटिलता और दुष्टता) ने मिलकर अयोध्या में एक असाध्य रोगी उत्पन्न किया, जिससे रामराज्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है। अब एक रात बची हुई है, क्या उपाय करूँ कि राम सिंहासन पर न बैठ सकें ! वह योजना बनाती है। कितनी भयंकर षड्यंत्रकारिणी थी वह और इतना ही नहीं, उसकी कुटिलता और दुष्टता पराकाष्ठा तक पहुँच जाती है, जब वह कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ?
         .........आगे कल.........

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