जितने भी मन के रोग हैं, उनके मूल में मोह है। इस मोह से ही रोगों की श्रृंखला शुरू होती है। जैसे शरीर के संदर्भ में वात, पित्त और कफ है, उसी तरह मन के संदर्भ में काम, क्रोध और लोभ है। मोह दोनों संदर्भों में समान रूप से जुड़ा हुआ है। गोस्वामीजी इन चारों को ही अधिक महत्व देते हैं और अगर हम देखें तो पायेंगे कि हमारे अन्तःकरण के चारों भाग इन चारों के एक-एक अधिष्ठान हैं। जैसे काम का अधिष्ठान है मन। इसलिए काम का एक नाम मनोज भी है। काम मन को आक्रांत करता है। काम का संबंध मुख्य रूप से व्यक्ति के मन से है। लोभ का केन्द्र है बुद्धि, क्रोध का अहंकार और मोह का अधिष्ठान है चित्त। इस तरह इन एक-एक व्याधियों का हमारे अन्तःकरण के एक-एक भाग से संबंध है। क्रोध का अहंकार से घनिष्ठ संबंध है। क्रोध जब भी आयेगा, कहीं न कहीं अहंकार से अवश्य जुड़ा होगा।
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