Tuesday, 3 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्....................

........कल से आगे.........
मंथरा कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ? क्योंकि भरत को राज्य मिलने पर केवल आपको आनन्द ही तो मिलेगा, पर इससे कौसल्या को दुःख तो नहीं मिलेगा। आनन्द तो तभी आयेगा, जब हमें आनन्द और कौसल्या को दुःख मिले। मंथरा कहना चाहती है कि कौसल्या बड़ी प्रसन्न हो रही है, बड़ा उत्सव मना रही है, बड़ा दान बाँट रही है, उन्हें जरा सबक सिखाना है, इसलिए ऐसा वरदान माँगिए जैसा मैं कह रही हूँ। यही है राजयक्ष्मा के साथ कोढ़। ईर्ष्यावृत्ति के साथ दुष्टता का योग और वह इस सीमा तक पहुँच जाती है कि वह केवल अपने लोभ की पूर्ति ही नहीं चाहती, बल्कि दूसरे को लाभ से वंचित करके उसे उत्पीड़ित भी करना चाहती है। ये रोग कैकेयी में नहीं है, पर रोगी मंथरा के पास वे थोड़ी देर बैठ गयीं और सारा रोग ज्यों का त्यों कैकेयी में आ गया, तो ये रोग संक्रामक भी है। इस प्रकार लोभ, ईर्ष्या और कुटिलता रूपी मन के ये जो रोग हैं, ये ही रामराज्य में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं और आज के समाज में भी यह रोग अत्यंत व्यापक रूप में फैला हुआ है।

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