Thursday, 26 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

लंका को जलाने के पीछे प्रभु का उद्देश्य क्या था ? कई लोग साधारणतया यह अर्थ ले लेते हैं कि रावण नगरों को जला देता था, इसलिए प्रभु ने भी उसके नगर को जलवा दिया, पर ऐसा भाव तो भगवान राम के चरित्र में है ही नहीं। बदले की भावना नहीं, यहाँ तो चिकित्सा है। बदले की वृत्ति का, हिंसा-प्रतिहिंसा का चक्र कभी समाप्त नहीं होता, पर जहाँ पर उद्देश्य सामने वाले का कल्याण है, वहाँ तो उसकी कठोरता में भी हित छिपा हुआ है। भगवान राम चाहते थे लंका जलाने के पीछे जो उनका उद्देश्य है, उसे रावण समझ ले। इससे उसका कल्याण होगा। रावण समझ बैठा था कि समस्त देवी-देवता और प्रकृति उसके अधिन हैं। अग्नि, जल, वायु और इन्द्र आदि सब उसके इशारे पर चलते हैं। प्रभु चाहते थे कि उसका भ्रम दूर हो और इस सत्य को समझ ले कि समस्त तत्वों का स्वामी वह नहीं, कोई और है। हनुमानजी ने लंका में आग लगा दी। लंका जलने लगी। जोरों से हवा चलने लगी। आग तेजी से फैल गयी। रावण ने मेघों को आदेश दिया कि वर्षा करके आग बुझाओ। वर्षा होने लगी, पर उससे क्या आग बुझी ? वह तो और भड़क उठी, मानो घी-तेल की वर्षा हो रही थी। लंका जलकर भस्म हो गयी। रावण उसे बचा नहीं पाया। तब क्या रावण को अपनी असमर्थता का बोध हुआ ? यही रावण की सबसे बड़ी समस्या है। श्रेष्ठतम वैद्य हो, श्रेष्ठतम औषध हो, पर रोगी उसे सेवन न करे, तब क्या होगा ?

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