Tuesday, 24 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

हनुमानजी के चरित्र में एक बड़ी विचित्र बात है। उनके चरित्र में पग-पग पर विचार है। हनुमानजी ने जब लंका को जला दिया तो भगवान ने उनसे पूछा कि सारे कार्य तो तुम विचारपूर्वक करते हो, लेकिन लंका जलाने के पूर्व तुमने जरा भी विचार नहीं किया। हनुमानजी ने कहा प्रभो ! जो कुछ मुझे करना था, वह मैंने विचारपूर्वक किया और जो मुझसे करवाया गया। वह करवाने वाला विचार करेगा या मैं करूँगा ? अभिप्राय क्या है ? हनुमानजी ने कहा कि मैं तो बँधकर ही गया था, यह देखने के लिए कि आप मुझसे क्या कराना चाहते हैं ? बँधे हुए से तो आप ही काम ले सकते हैं। रावण ने कहा कि इस बन्दर को मार डालो, पर हनुमानजी ने अपने को बचाने की कोई चेष्टा नहीं की। प्रभो ! आप कह सकते हैं कि तुम तो वाटिका में बड़े दाँव-पेंच दिखा रहे थे। अब यहाँ भी कुछ कला दिखाते। महाराज ! जहाँ खुला हुआ था, वहाँ कला का प्रयोग किया, पर यहाँ तो बँधा हुआ हूँ, अब तो कला का प्रयोग आप ही को करना है। अब मैं अपने को बचानेवाला नहीं हूँ। अब तो आप जानें और आपका काम जाने। प्रभु ने विभिषण को भेज दिया।  विभिषण ने कहा कि मत मारिए और रावण मान गया, पर कुछ न कुछ दण्ड तो देना ही होगा, अतः इस बन्दर की पूँछ को नष्ट कर दो। अब पूँछ नष्ट करने में क्या कठिनाई थी ? कह देता कि तलवार से पूँछ काट दो, लेकिन प्रभु तो रावण जैसे लोगों से भी अपना काम करा लेते हैं। रावण को पूँछ नष्ट करने का क्या उपाय सूझा - पहले इसकी पूँछ में कपड़ा लपेटो, फिर घी-तेल डालो और आग लगा दो। हनुमानजी ने कहा, प्रभु ! लंका जलाने की योजना तो आपकी ही थी और प्रबंध तो बड़ा ही विलक्षण था।

1 comment:

  1. अति उत्तम. आपने पूज्य गुरुदेव के अमृतमयी वचनों का सुंदर संकलन प्रस्तुत करके अत्यंत ही श्रेष्ठ कार्य किया है. आपको सादर धन्यवाद.

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