Saturday, 21 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

गोस्वामीजी बड़ी साहित्यिक भाषा में लिखते हैं कि हनुमानजी ने रावण का रोग पकड़ लिया और कहा कि तुम इस वस्तु को छोड़ दो - रावण तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है मोह। तुम मोहग्रस्त हो। सत्य को जानकर भी तुम अपने जीवन में उसे अस्वीकार करने के अभ्यस्त हो गये हो। यही तुम्हारे अन्तःकरण का मोह है। इस मोह का परिणाम यह हुआ है कि तुम्हारे अन्तःकरण में घोर अभिमान हो गया है। इसलिए इसे दूर करने के लिए अब मैं दवा दे रहा हूँ - भगवान की भक्ति करो। भगवान की भक्ति ही संजीवनी औषध है, लेकिन यहाँ वैद्य और रोगी की क्या स्थिति है ? हनुमानजी ने बड़ा विचित्र व्यंग्य किया। यह समझने योग्य है। रावण हँस रहा है। हनुमानजी बँधे हुए हैं। और रावण सिंहासन पर तनकर बैठा हुआ है। रावण ने कहा कि मैंने यह तो सुना था कि गुरु शिष्य के बंधन को खोलकर उसे मुक्त कर देता है। शिष्य बंधन में होता है और गुरु मुक्त होते हैं और वे शिष्य को भी मुक्ति प्रदान करते हैं, पर इस बन्दर को तो देखो, खुद तो बँधा हुआ है और अपने को गुरु समझ रहा है। अपने को तो छुड़ा नहीं पाया और मुझे छुड़ाने आया है। देखो ! भला कैसी बात है ?
           ........ आगे कल ......

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