बुराइयाँ और दुर्बलताएँ तो हमारे मन में भी हैं, किन्तु क्या हम अपनी बुराइयों को बुराई के रूप में देख पा रहे हैं ? बुराई में अगर हमें बुराई दिख रही है तो उससे बचने की पूरी संभावना है, पर जब हमें बुराई में भी अच्छाई दिखने लगे, तब उन बुराइयों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है, तब वह असाध्य हो जाती है।
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