भगवान ने यह जो तीन रूप बालि को दिखाया, इसका अभिप्राय क्या है ? वे बालि को अवसर देते हैं। बालि कहता है कि ब्रह्म सम है। भगवान सुग्रीव को भेजकर उसे अवसर देते हैं कि अगर तुम समझते हो कि ब्रह्म सम है तो तुम भी समत्व में आरूढ़ हो जाओ, पर तुम्हारे अन्तःकरण में तो भेदबुद्धि है। इस भेदबुद्धि से प्रेरित होकर तुमने जो कर्म किया, इसका परिणाम भी मैंने कर्मसिद्धान्त के ईश्वर के रूप में तुम्हें दे दिया और अब अंदर तुम्हें भक्ति का भगवान चाहिए तो लो मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। भक्ति भगवान की कृपा का पक्ष है, करुणा का पक्ष है। ज्ञान और कर्म का ईश्वर निराकार है, पर भक्ति का ईश्वर साकार है। वहाँ छिपना नहीं, प्रत्यक्ष होना ही ईश्वर का स्वरूप है। करुणासागर भगवान बालि के सामने खड़े हो गये। बालि पहले तो शास्त्रार्थ करता है, बड़ा तर्क - वितर्क करता है, पर जब भगवान के चुनाव करने का अवसर आया, तब उसने वेदांत के ब्रह्म और कर्मसिद्धान्त के ईश्वर के स्थान पर भक्ति के भगवान का ही चुनाव किया।
Thursday, 31 December 2015
Wednesday, 30 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
भगवान ने बड़ा अनोखा कार्य किया था। बालि की छाती पर जब बाण लगा और वह गिर पड़ा, तब प्रभु उसके सामने आ गये। यह उनकी कृपा का स्वरूप है। सामने आना कोई आवश्यक नहीं था। कर्म का फल दे दिया, वृक्ष की आड़ में खड़े रहते और बालि की मृत्यु हो जाती। भगवान का चुनाव भी बड़ा अद्भुत होता है। बालि के शिर पर बाण नहीं मारा। उसका शिर नहीं काटा। ह्रदय पर बाण मारा - यह सांकेतिक भाषा है। इसका अभिप्राय क्या है ? भगवान ने सोचा कि इसका शिर तो ठीक है अर्थात बुद्धि ठीक है, बातें तो ज्ञान की करता है, पर ह्रदय में अभिमान है। अभिमान नष्ट करना है, इसलिए ह्रदय पर बाण मारा और जैसे ही अभिमान नष्ट हुआ, वे प्रकट हो गये। अब वे वेदांत के ब्रह्म और कर्मसिद्धान्त के ईश्वर नहीं, बल्कि कृपालु ईश्वर भक्तों के भगवान के रूप में प्रकट हो गये। ये ईश्वर भक्तों के लिए अवतरित होते हैं, मनुष्यरूप में अवतार लेते हैं। बालि ज्यों ही गिरा। भगवान राघवेन्द्र तुरंत सामने प्रकट हो गये।
Tuesday, 29 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
सुग्रीव के जीवन में भगवान ने अपने दो रूपों का परिचय दिया, लेकिन बालि के सामने उन्होंने तीन रूपों का परिचय दिया। भगवान बालि के सामने नहीं गये, उन्होंने वृक्ष की आड़ से बाण चलाया। इसका अभिप्राय क्या है ? भगवान यह बताना चाहते थे कि कर्मसिद्धान्त का जो ईश्वर है, वह बिना सामने आये ही बाण चलाता है। भगवान का बाण क्या है ? गोस्वामीजी लंकाकाण्ड के प्रारंभ में कहते हैं - काल का धनुष, समय का बाण और उसको चलाने वाला है ईश्वर। यह ईश्वर छिपा हुआ है। सामने प्रत्यक्ष नहीं है। वृक्ष की आड़ में बाण चलाता है। यह वृक्ष क्या है ? वृक्ष की व्याख्या गोस्वामीजी ने विनयपत्रिका में की है - संसार एक घनघोर वन है और व्यक्ति के कर्म ही उसके वृक्ष हैं और इसका तात्पर्य यह है कि कर्मसिद्धान्त की मान्यता है कि ईश्वर कर्म का फल कर्म की आड़ से देता है। वह कालरूपी धनुष-बाण के माध्यम से जीव को कर्म का फल देता है। कर्म का फल देने वह प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता। कर्मसिद्धान्त में यही ईश्वर का स्वरूप है। इसलिए जब बालि ने पूछा कि आपने मुझे छिपकर क्यों मारा ? सामने क्यों नहीं आये ? तो प्रभु ने कहा कि जब तुम कर्मसिद्धान्त को मानते हो और मुझे ईश्वर समझते हो, तो धर्मशास्त्र में तो यही कहा गया है कि ईश्वर कर्म की आड़ में फल देता है। वह फल देने के लिए प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता। अतः मैंने तुम्हें कर्म की आड़ से तुम्हारे कर्म का फल दिया।
Sunday, 27 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
भगवान सुग्रीव को भी इसी प्रसंग में शिक्षा देते हैं। भगवान ने जब बालि को मारने की प्रतिज्ञा की तो सुग्रीव के मन में क्षणिक ज्ञान-वैराग्य आ गया। उन्होंने भगवान राम से कहा कि महाराज ! मैं तो समझता हूँ कि यह संसार मिथ्या है और अब मेरे मन में कोई भेद नहीं रह गया है। इसलिए अब ऐसी कृपा कीजिए कि सब कुछ छोड़कर मैं आपका भजन करूँ। भगवान को बड़ी हँसी आयी कि कहाँ तो मैं वेदांत के ब्रह्मपद को छोड़कर भक्तों के लिए अवतार लेकर आया हूँ, पक्षपाती बना हूँ और ये बन गये वेदान्ती। बड़ी विचित्र बात है, कह रहे हैं कि शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं रह गया। भगवान ने कहा कि जरा कसौटी पर कसकर देखें कि इसका ज्ञान-वैराग्य कितना पक्का है। बाद में बालि का मुक्का पड़ा। भगवान तो यही परीक्षा ले रहे थे कि मुक्का पड़ने पर भी अगर वैराग्य बना रहता है, तब तो वह पक्का है, पर उस मुक्के से सुग्रीव का ज्ञान-वैराग्य हवा हो गया। वास्तव में वह तो क्षणिक वैराग्य था। जब लौटकर आये तो भगवान ने कहा कि क्या करूँ ? इसमें भगवान का एक दूसरा व्यंग्य यह भी था कि भई ! एक वेदान्ती तो तुम्हारा भाई बालि है, जो कह रहा है कि ब्रह्म सम है और दूसरे वैराग्यवान तुम हो, जिसकी दृष्टि में शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं है। तो मैं भी ऐसे दो महान ज्ञानी और वैरागी में भला भेद क्यों करूँ ? तुम दोनों का हाल बिल्कुल एक जैसा है। इसलिए मैंने तुम दोनों के बीच हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया, पर सुग्रीव के चरित्र में यही एक अच्छा पक्ष है कि वे अपनी भूल को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। कहते हैं - प्रभु ! यह मेरा भाई नहीं, शत्रु है, मेरा काल है, मेरी रक्षा कीजिए। सुग्रीव तुरन्त ज्ञानी से भक्त बन गये और श्रीराम वेदांत के ब्रह्म से भक्त के भगवान बन गये।
Saturday, 26 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
जब तारा ने बालि से कहा कि सुग्रीव आपको जो चुनौती दे रहा है, इस घटना के पीछे बल किसका है ? जरा इस पर तो ध्यान दीजिए। तो बालि ने कहा कि मैं जानता हूँ कि इसके पीछे भगवान श्रीराम का बल है। तब तारा ने कहा कि तब तो आपको और भी सावधान रहना चाहिए। उसने कहा कि तुम राम का नाम सुनकर घबरा गयीं, तुम नहीं जानती पर मुझे राम का ज्ञान है। तुम भीरू हो, डर जाती हो, तुम्हें सच्चा ज्ञान नहीं है। भगवान राम तो समदर्शी हैं। भगवान राम के समत्व का प्रतिपादन करके जब बालि चलने लगा तो गोस्वामीजी से किसी ने कहा कि वेदांत की कितनी बढ़िया बात आज बालि ने कही है, कम से कम आज तो इसे ज्ञानी की उपाधि दे दीजिए। गोस्वामीजी ने कहा कि यह ज्ञानी नहीं है ? बोले - यह महा अभिमानी है। अभिप्राय यह है कि अगर उसे सच्चा ज्ञान हो जाता तो समझ लेता कि वस्तुतः सुग्रीव में और मुझमें रंचमात्र भी भेद नहीं है। ज्ञान हो जाने पर तो उसमें ब्रह्म का समत्व आ जाता, पर उसमें यह वृत्ति आ गयी कि हम सुग्रीव को सतायेंगे और भगवान कुछ नहीं बोलेंगे।
Friday, 25 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
ईश्वर समदर्शी तो है, पर इस ज्ञान की प्रतिक्रिया या फल हमारे जीवन में क्या होना चाहिए ? यह होना चाहिए कि ब्रह्म समदर्शी है और हम ब्रह्म के अंश हैं। जीव ब्रह्म से अभिन्न है, ऐसा बोध होने पर अगर हमारे अन्तःकरण में समत्व आ जाय तो ब्रह्म के समत्व का ज्ञान बड़ा सार्थक और कल्याणकारी हो, पर यदि हम उल्टा अर्थ ले लें, तब तो यह समत्व का ज्ञान बड़ा खतरनाक है। क्यों ? पता चल गया कि भगवान सम है, पाप और पुण्य, दोनों में तटस्थ है तो प्रसन्न हो गये कि खूब पाप करो, क्योंकि जब वे सम हैं तब तो वे पाप और पुण्य में भेद करेंगे नहीं। बालि ने यही अर्थ लिया। भगवान अगर सम हैं तो मैं सुग्रीव पर प्रहार करता रहूँगा और भगवान देखते रहेंगे। इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्म के समत्व का ज्ञान अगर किसी व्यक्ति को समाज में अत्याचारी बना दे और उस समत्व ज्ञान की आड़ में व्यक्ति मनमाना आचरण करने लगे तो उसका क्या परिणाम होगा ? उसका परिणाम दिखाई देता है बालि के जीवन में।
Thursday, 24 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्......
प्रभु की कृपादृष्टि बालि और सुग्रीव दोनों पर है। वे दोनों का कल्याण कर रहे हैं। एक ओर सुग्रीव हैं, जिन्हें भगवान राम युद्ध के लिए प्रेरित कर रहे हैं और उनकी दुर्बलताओं को धीरे - धीरे दूर कर रहे हैं और दूसरी ओर तो बड़ी अनोखी बात देखने में आती है। सुग्रीव को वे यह कहकर युद्ध करने भेज देते हैं कि बालि को वे मारेंगे, पर उस युद्ध में जब बालि सुग्रीव पर प्रहार करता है तब भगवान कोई हस्तक्षेप नहीं करते। बड़ा अनोखा कार्य है प्रभु का। बेचारे सुग्रीव बालि के मर्मान्तक प्रहार से अत्यधिक कष्टिक होकर अपने स्वभाव के अनुसार भागे और भगवान के पास आकर उलाहना देते हुए बोले कि महाराज! आपने तो कहा था - मैं एक ही बाण से बालि को मारूँगा , पर बालि मुझ पर प्रहार करता रहा और आपने उसे नहीं मारा, तो इस पर भगवान ने कहा कि समस्या यह हो गयी- मैं पहचान नहीं पाया कि कौन बालि है और कौन सुग्रीव। इसलिए मैंने नहीं मारा। यह वेदांत का ब्रह्म है। यहाँ पर भगवान ने बालि को अपने तीन रूपों का दर्शन कराया- वेदांत का ब्रह्म, कर्म सिध्दांत का ईश्वर और भक्ति का भगवान। और वे इन तीन रूपों में से किसी एक रूप को चुनने की उसे स्वतंत्रता दे देते हैं कि इनमें से जो रूप तुम्हें अभीष्ट हो उसे स्वीकार कर लो।
Wednesday, 23 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
गीता और रामायण दोनों का दर्शन यही है। गीता में भगवान अर्जुन को इसी सत्य का साक्षात्कार कराते हैं। महाभारत के रणांगन में उन समस्त योद्धाओं को किसने मारा ? मारा तो भगवान ने। क्योंकि भगवान ने अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन कराया, तो उसमें अर्जुन ने देखा कि सारे योद्धा मरे पड़े हैं। अर्जुन ने पूछा कि महाराज! इन्हें मारा किसने ? भगवान बोले , मैंने। तो अब मुझे नहीं मारना पड़ेगा। बोले कि नहीं, पर लड़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा। मैंने भले ही इन्हें पहले से ही मार दिया है, पर युद्ध तो तुम्हें ही करना है और यही भगवान की प्रेरणा है। कर्म तुम करो, पर परिणाम तो मैं ही दूँगा। लड़ना कर्म है और अन्त में परिणाम विजय है। अगर मैं जीव से कह दूँ कि तुम मत लड़ो, तब तो वह तमोगुणी और निष्क्रिय हो जायेगा और यदि वह यह जान ले कि विजय भी उसके बस की बात है, तो उसके अन्तःकरण में अभिमान आ जायेगा।
Tuesday, 22 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
पहले भगवान श्री राघवेन्द्र सुग्रीव को बालि से लड़ने भेजते हैं। वहाँ भी बड़ी अनोखी दार्शनिक और मधुर बात आती है। क्या ? भगवान ने प्रतिज्ञा की - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि बालि को एक ही बाण से मारूँगा। सुग्रीव बड़े प्रसन्न हुए, पर भगवान ने बड़ी अनोखी लीला की। क्या ? सुग्रीव से कहा कि तुम गर्जना करके बालि को चुनौती दो और उससे युद्ध करो। सुग्रीव तो आश्चर्य से मुँह ताकने लगे। बोले कि महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु बोले कि मैं मारूँगा , लेकिन लड़ोगे तुम। यह तो बड़ी विचित्र बात है, पर यही तो दर्शन है। यह बड़े महत्व की बात है। जब भगवान ने प्रतिज्ञा की कि वे बालि को मारेंगे तो उन्हें चाहिए था कि वे स्वयं बालि को चुनौती देते, युद्ध करते और उसे मार डालते, पर भगवान कहते हैं कि लड़ना तो तुम्हें ही है और मारना मुझे है। यह सत्य केवल सुग्रीव के संदर्भ में नहीं, यह तो सबके जीवन का सत्य है। अभिप्राय यह है कि वास्तव में बालि के विजेता तो भगवान राम ही हैं, पर सुग्रीव उसके निमित्त बने। सुग्रीव इस दर्शन को स्वीकार कर लेते हैं। यह बोध ही भक्ति का स्वरूप है, जिसे भगवान सुग्रीव के जीवन में क्रमशः विकसित करते हैं।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्........
पहले भगवान श्री राघवेन्द्र सुग्रीव को बालि से लड़ने भेजते हैं। वहाँ भी बड़ी अनोखी दार्शनिक और मधुर बात आती है। क्या ? भगवान ने प्रतिज्ञा की - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि बालि को एक ही बाण से मारूँगा। सुग्रीव बड़े प्रसन्न हुए, पर भगवान ने बड़ी अनोखी लीला की। क्या ? सुग्रीव से कहा कि तुम गर्जना करके बालि को चुनौती दो और उससे युद्ध करो। सुग्रीव तो आश्चर्य से मुँह ताकने लगे। बोले कि महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु बोले कि मैं मारूँगा , लेकिन लड़ोगे तुम। यह तो बड़ी विचित्र बात है, पर यही तो दर्शन है। यह बड़े महत्व की बात है। जब भगवान ने प्रतिज्ञा की कि वे बालि को मारेंगे तो उन्हें चाहिए था कि वे स्वयं बालि को चुनौती देते, युद्ध करते और उसे मार डालते, पर भगवान कहते हैं कि लड़ना तो तुम्हें ही है और मारना मुझे है। यह सत्य केवल सुग्रीव के संदर्भ में नहीं, यह तो सबके जीवन का सत्य है। अभिप्राय यह है कि वास्तव में बालि के विजेता तो भगवान राम ही हैं, पर सुग्रीव उसके निमित्त बने। सुग्रीव इस दर्शन को स्वीकार कर लेते हैं। यह बोध ही भक्ति का स्वरूप है, जिसे भगवान सुग्रीव के जीवन में क्रमशः विकसित करते हैं।
Monday, 21 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
बड़ी विलक्षण बात है। जब तक बालि विजेता रहा, तब तक वह सत्य से दूर रहा और जब उसके जीवन में पराजय हुई तब उस पराजय के क्षण में उसके समक्ष सत्य का, तत्वज्ञान का उदय हुआ। इस पूरे प्रसंग में बालि के चरित्र का क्रमिक विकास दिखाई देता है। यह ज्ञान का संदर्भ है। शरीर का परित्याग करते समय बालि को रंचमात्र भी दुःख नहीं होता। यह बालि के चरित्र का चरम विकास है, उसके जीवन की सर्वोत्कृष्ट परिणति है। कहीं तो वह रावण को पराजित करके उसे मित्र बना लेता है, कहीं दुन्दुभि को मारकर भी वह पुरस्कार के स्थान पर शाप पा लेता है। अनगिनत विजय प्राप्त करके उसके अभिमान की ही वृद्धि होती चली जाती है, यह है सत्कर्म के साथ जुड़ी हुई समस्या। बालि सत्कर्म और पुण्य का प्रतीक है। सत्कर्म और पुण्य के साथ आने वाली समस्याओं को बालि के चरित्र के माध्यम से प्रकट किया गया है।
Sunday, 20 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
बालि ने अनेक राक्षसों को मारा, लेकिन उसकी विजय संसार के लिए कल्याणकारी न होकर उसके अहंकार को बढ़ाने वाली ही होती थी। इससे संबंधित एक सांकेतिक कथा है। ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते थे। उनसे प्रभु ने पूछा कि बालि जब सर्वत्र तुम्हारा पीछा करता रहा, तो यहाँ क्यों नहीं आया ? सुग्रीव ने बताया कि बालि को शाप है कि वह इस पर्वत पर नहीं आ सकेगा। यह बड़ी सांकेतिक कथा है। दुन्दुभि नाम के एक राक्षस ने बालि को चुनौती दी थी। बालि ने युद्ध में उसे मार डाला। इसी प्रसंग में मुनियों ने उसे शाप दिया था। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की बात क्या हो सकती है ? राक्षस का नाश करने वाले को मुनियों से साधुवाद और आशीर्वाद मिलना चाहिए या शाप ? पर कथा बड़ी सांकेतिक है। राक्षस को मारने के बाद तो बालि को आशीर्वाद अवश्य मिला होता, पर राक्षस को मारने के बाद उसने जो किया, वह उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो गया। क्यों ? बालि ने सोचा कि मैंने दुन्दुभि को मार तो डाला, पर देखा किसने ? तो ऐसा करें कि जरा लोग देखें। ऋष्यमूक पर्वत पर बहुत से ऋषि-मुनि रहते थे। इस शव को वहीं फेंक दें, ताकि लोग देख लें कि हमने कितनी बड़ी विजय पायी है। और उसने दुन्दुभि का शव उठाकर ऋषि-मुनियों के आश्रम में फेंक दिया। परिणाम क्या हुआ ? मुनियों का सारा आश्रम अपवित्र हो गया। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने शाप दे दिया कि जिस व्यक्ति ने ऐसा किया है, वह यदि इस पर्वत पर आयेगा तो उसकी मृत्यु हो जायेगी। बड़ा सूक्ष्म संकेत है। सत्कर्म में अगर दम्भ और अभिमान सम्मिलित हो जाय, व्यक्ति अगर सत्कर्म को भी प्रदर्शन की वस्तु बना ले, तब क्या होगा ? जो लोग सत्कर्म करके दिखावा करते हैं, वे अन्यत्र तो सम्मान प्राप्त करने के अधिकारी हैं, पर ऋष्यमूक पर्वत पर जाने के अधिकारी नहीं हैं। वे तो वस्तुतः शाप और मृत्यु के ग्रास बनने के अधिकारी हैं।
Saturday, 19 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
दो शब्द हैं - मुक्ति और जीवनमुक्ति। मुक्ति तो रावण की भी हुई, पर कब ? जब उसके शरीर का नाश हुआ। इसका अभिप्राय यह है कि उसने अपने को शरीर की सीमा में घेर रखा था। शरीर से अलग होने पर ही रावण मुक्त हुआ, पर गीधराज की विशेषता यह है कि जीवित रहते हुए भी शरीर में रहते हुए भी वे मुक्त हैं, क्योंकि शरीर के बंधन को उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया। उन्होंने भगवान से कह दिया कि अब इस शरीर को रखने की आवश्यकता नहीं है। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि एक ओर तो मृत्यु का विजेता रावण है, जो मृत्यु का ग्रास होने जा रहा है और दूसरी ओर मृत्यु का ग्रास बन जाने वाले गीधराज हैं, जो मृत्यु के पूर्व ही मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे जानते हैं कि शरीर तो नाशवान है, अनित्य है। नित्य और अनित्य के भेद को जान लेने के कारण अपने विवेक से उन्होंने काल के दुःख को जीत लिया। इसलिए उनके होंठों पर हँसी आ गयी। सामने मृत्यु खड़ी होने पर भी उन्हें दुःख नहीं है।
Friday, 18 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
जब भगवान गीधराज से यह प्रस्ताव करते हैं - मेरे विचार से आप कुछ दिन और जीवित रहें। आप इस पुत्र की सेवा का सुख देखें और मुझे पिता का आनन्द दें। गोस्वामीजी ने यहाँ बड़ी अनोखी बात कही है। ईश्वर सच्चिदानन्द है, आनन्दघन है और जीव के जीवन में हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि लगे रहते हैं, परन्तु यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है - ईश्वर रो रहे हैं और जीव हँस रहा है। इससे बढ़कर विचित्र दृश्य और क्या होगा ? भगवान राम आँसू बहा रहे हैं और गीधराज जिनके पंख कटे हुए हैं, इतने कष्ट में हैं, भगवान उनसे जीवित रहने का प्रस्ताव करते हैं। सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। भगवान का प्रस्ताव उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इसका तात्पर्य क्या है ? प्रभु श्रीराम ने कहा कि आप कुछ दिन और जीवित रहिए। इसका अर्थ है कि उसके बाद मरिए। तो कभी न कभी मरना ही पड़ेगा। मृत्यु तो अवश्सम्भावी है, तो फिर आज मैं इस सार्थक मृत्यु को क्यों छोड़ दूँ ? इस शरीर का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सकता था, वह हो गया। पवित्र कार्य में मेरा शरीर उत्सर्ग हो गया और इस समय मुझे आपका दर्शन हो रहा है। जिनका नाम स्मरण करना भी कठिन है, उनका साक्षात दर्शन हो रहा है। ऐसी विलक्षण मृत्यु को छोड़ दूँ, तो मुझसे बढ़कर अभागा और कौन होगा ?
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
जब भगवान गीधराज से यह प्रस्ताव करते हैं - मेरे विचार से आप कुछ दिन और जीवित रहें। आप इस पुत्र की सेवा का सुख देखें और मुझे पिता का आनन्द दें। गोस्वामीजी ने यहाँ बड़ी अनोखी बात कही है। ईश्वर सच्चिदानन्द है, आनन्दघन है और जीव के जीवन में हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि लगे रहते हैं, परन्तु यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है - ईश्वर रो रहे हैं और जीव हँस रहा है। इससे बढ़कर विचित्र दृश्य और क्या होगा ? भगवान राम आँसू बहा रहे हैं और गीधराज जिनके पंख कटे हुए हैं, इतने कष्ट में हैं, भगवान उनसे जीवित रहने का प्रस्ताव करते हैं। सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। भगवान का प्रस्ताव उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इसका तात्पर्य क्या है ? प्रभु श्रीराम ने कहा कि आप कुछ दिन और जीवित रहिए। इसका अर्थ है कि उसके बाद मरिए। तो कभी न कभी मरना ही पड़ेगा। मृत्यु तो अवश्सम्भावी है, तो फिर आज मैं इस सार्थक मृत्यु को क्यों छोड़ दूँ ? इस शरीर का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सकता था, वह हो गया। पवित्र कार्य में मेरा शरीर उत्सर्ग हो गया और इस समय मुझे आपका दर्शन हो रहा है। जिनका नाम स्मरण करना भी कठिन है, उनका साक्षात दर्शन हो रहा है। ऐसी विलक्षण मृत्यु को छोड़ दूँ, तो मुझसे बढ़कर अभागा और कौन होगा ?
Thursday, 17 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
पूर्व विषय के आगे .....
गीधराज जटायु और रावण का युद्ध हुआ और उस युद्ध में ऐसा लगा जैसे रावण जीत गया और जटायु हार गये। रावण ने अपने कृपाण से उनके पंख काट दिये और वे पृथ्वी पर गिर पड़े, लेकिन कितनी विलक्षण बात है। जीता कौन और हारा कौन ? देखने में तो यही लगता है कि रावण जीत गया और गीधराज हार गये, किन्तु यदि अंतरंग में पैठकर देखें तो एक दूसरा ही सत्य सामने आता है। गीधराज गिरकर जमीन पर पड़े हैं। पक्षी का पंख कट जाना माने उसके जीवन में व्यर्थ हो जाना है, लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि यहाँ तो दूसरा दृश्य है। क्या ? कुछ देर बाद जटायु ने देखा कि भगवान राम चले आ रहे हैं। गदगद हो गये। सोचा कि चलो पंख कटना भी सार्थक हो गया। कैसे ? पंख होता तो मुझे उड़कर भगवान के पास जाना पड़ता। अब पंख नहीं हैं तो प्रभु स्वयं चलकर मेरे पास आ रहे हैं। पंख की सार्थकता अर्थात साधना की सार्थकता ईश्वर को पाने में है, पर जहाँ साधना और पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो गयी तो भगवान स्वयं कृपा करके आ गये।
Wednesday, 16 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
तुलसीदासजी से किसी ने पूछा कि घोड़े पर बैठे हुए श्रीराम को देखने के लिए कौन-कौन आया ? तो उन्होंने कहा कि भई ! श्रीराम की इस झाँकी का दर्शन करने के लिए वैसे तो देवता, मुनि तथा मनुष्य आदि सभी आये, किन्तु सबसे विशेष बात यह है कि प्रभु के इस रूप का साक्षात्कार करने के लिए भगवान शंकर भी आये जो कि सर्वदा समाधि में लीन रहते हैं। गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि भगवान शंकर ने विचार किया कि अब इस मन को एकाग्र करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जब भगवान को भी चंचल घोड़े की आवश्यकता है तो फिर हम इस चंचल को अचंचल क्यों बनायें ? आगे अश्व का वर्णन करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि यह कोई साधारण घोड़ा नहीं है। अपितु यह तो साक्षात कामदेव ही घोड़े के वेश बनाकर प्रभु की सेवा में आ गया है। गोस्वामीजी इस प्रसंग के माध्यम से मानो यह बताना चाहते हैं कि जिस काम ने आज तक संसार पर शासन किया, उस मनोज की लगाम हमें ईश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। हमारे अन्तःकरण में यदि कहीं यह दूल्हा सचमुच आ जाये, तथा आकर हमारे मन और मनोज के घोड़े पर बैठ उसकी लगाम को कसकर पकड़ ले तो हमारे अन्तःकरण की चंचलता का भी सदुपयोग हो सकता है।
Tuesday, 15 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने भगवान श्री राघवेन्द्र तथा विदेहनन्दिनी श्रीसीताजी के विवाह का बड़ा ही मधुर चित्र प्रस्तुत किया। किन्तु अनोखापन यह है कि उस वर्णन में वे अपनी लेखनी के माध्यम से एक ओर तो दिव्य रस की सृष्टि करते हैं, तथा दूसरी ओर वे उसमें अपनी दार्शनिक शैली को अवश्य जोड़ देते हैं। यह भगवान श्रीराम का विवाह जो त्रेतायुग का सत्य है, उसे हम केवल त्रेतायुग या भूतकाल के सत्य के रूप में ही देखने की चेष्टा न करें, अपितु प्रयत्न तो यह करना चाहिए कि भूतकाल का यह सत्य हमारे वर्तमान जीवन का सत्य बन जाय। त्रेतायुग में महाराज श्री जनक के मण्डप में संपन्न होने वाले उस विवाह की समग्र प्रक्रिया हमारे जीवन में ही संपन्न हो जाय। हम स्वयं जनक बन जायँ, सुनयना बन जायँ, अथवा जनकपुरवासिनी स्त्रियों में से कोई भावमयी स्त्री बनकर भगवान से नाता जोड़ सकें।
गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।
गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।
Monday, 14 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
आज अगहन मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी है, कल पंचमी भगवान श्री सीताराम का विवाह है, इसलिए विषयांतर होते हुए आइये परम पूज्य गुरुदेव भगवान की दृष्टि से विवाह प्रसंग में प्रवेश करें -
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
Sunday, 13 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रावण की तरह असुरों की भाँति अगर कोई व्यक्ति काल को जितने की चेष्टा करेगा तो वह कालजन्य दुःख को कभी नहीं जीत पायेगा। कालजन्य दुःख को जीतने में विवेक ही सहायक है। जिस व्यक्ति में विवेक है, वही कालजन्य दुःख से बच सकता है। इसलिए रामचरितमानस में सर्वत्र यह संकेत दिया गया है कि कालजन्य दुःख पर विजय पाने के लिए देह को अमर बनाने की चेष्टा सही उपाय नहीं है, वह तो देहासक्ति से ऊपर उठकर ही प्राप्त की जा सकती है। इस प्रयास में जहाँ रावण के जीवन में असफलता दिखाई देती है, वहीं रामायण के ऐसे दो पात्र हैं, जिनके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वे जीवित रहें, पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। वे दो पात्र हैं गीधराज जटायु और बालि।
Saturday, 12 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
रामायण में बड़ी अच्छी बात कही गयी है। विभिषण ने भगवान राम से कहा कि प्रभो ! रावण यज्ञ कर रहा है। तो यह तो बड़ी अच्छी बात है। जो यज्ञ नष्ट करता था, अब वह यज्ञ कर रहा है, पर विभिषण आगे कहते हैं - अगर उसका यज्ञ सिद्ध हो गया, तो वह अभागा मरेगा नहीं। पढ़कर बड़ा विचित्र लगता है। नहीं मरेगा तो भाग्यवान है कि अभागा है ? कोई चिरायु होता है तो लोग कहते हैं कि वह बड़ा भाग्यवान है। कोई अल्पायु होता है तो कहते हैं, उसका भाग्य अल्प था, पर विभिषण बड़ी सार्थक बात कहते हैं। विभिषण के कहने का अभिप्राय यह है कि जिस मृत्यु से मनुष्य को मुक्ति मिलने वाली है, उस मृत्यु को टालते जाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे बढ़कर दुर्भाग्य रावण का और क्या होगा कि मुक्तिदाता के रूप में साक्षात श्रीराम खड़े हैं और रावण को शरीर से मुक्त करना चाहते हैं, पर रावण तो उस देह के बंधन में और अधिक बँधता जा रहा था। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की पराकाष्ठा रावण के लिए और क्या होगी ?
Friday, 11 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
रामचरितमानस में एक ओर रावण जैसा पात्र है, जो शरीर को अमर बनाने की चेष्टा करता है और अन्त में मृत्यु का ग्रास बन जाता है। इतना ही नहीं, बल्कि जिस शरीर को रावण अमर बना लेना चाहता है, उस शरीर की अन्तिम परिणति क्या है ? उस ओर इंगित करते हुए बड़ी सांकेतिक भाषा में कहा गया है कि लंका का रणांगन रावण के शिर और भुजाओं से पटा पड़ा है। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि रावण ने अमरता का अर्थ ले लिया शरीर की अमरता से और भगवान शंकर को शिर चढ़ाकर उनसे यह वरदान प्राप्त कर लिया कि शिर कटने के बाद फिर नया शिर निकल आये। यह वरदान पाकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ और सोचने लगा कि अब तो मैंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लिया, काल की समस्या का समाधान मिल गया। क्योंकि व्यक्ति के शिर कटने पर उसकी मृत्यु हो जाती है, पर मेरा शिर कटने पर नया शिर निकल आयेगा और मेरी मृत्यु नहीं होगी, लेकिन रावण का गणित उल्टा सिद्ध हुआ। रावण जब भगवान से युद्ध करता है तो भगवान उसका शिर काट देते हैं, पर जैसे ही उसका शिर कटता, एक नया शिर निकल आता। रावण पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ? उसने कहा कि बस, राम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। अधिक से अधिक यह शिर ही काट सकता है, पर शिर काटने से तो मैं मरा नहीं, मेरा नया शिर निकल आया, तब इस मूढ़ता के कारण रावण के शव की ऐसी दुर्दशा हुई, वैसी तो सारी सृष्टि में साधारण से साधारण व्यक्ति की भी नहीं होती। लंका का सारा रणांगन रावण के शिर और भुजाओं से पट गया। मंदोदरी बड़े दुखपूर्वक देखती है कि चील-गीध मँडरा रहे हैं, सियार-कुत्ते दौड़ रहे हैं और रावण के शिर और भुजाओं को नष्ट कर रहे हैं। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि शरीर तो अनित्य है ही, पर उसे अमर बनाने की चेष्टा में उसकी अन्तिम परिणिति अतीव विभत्स हो सकती है, बड़ी दुर्गति हो सकती है। रावण के लिए वरदान भी अभिशाप बन गया।
Thursday, 10 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
एक प्रकार का दुःख है मृत्यु, जिसे हम कालजन्य दुःख कह सकते हैं। वैसे तो काल शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है, पर दृष्टांत के लिए यहाँ समझें कि कालकृत दुःख का अभिप्राय है मृत्यु का दुःख। अब इस दुःख पर विचार करें। मृत्यु अवश्सम्भावी है। जन्म लेने पर मृत्यु अवश्य होगी। यह अत्यंत स्वाभाविक है। इससे बचा नहीं जा सकता। इस दुःख को दूर करने का प्रयास व्यक्ति दो प्रकार से कर सकता है। एक तरह से रावण ने भी इस दुःख पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किया। यह असुरों की पद्धति है। असुरों ने सोचा कि अगर हम अमर हो जायँ, हमारा शरीर अमर हो जाय, तो हम काल पर विजय प्राप्त कर लेंगे। शरीर को अमर बनाने के लिए स्वस्थ रहने का प्रयत्न करें। वेदों में भी कहा गया कि व्यक्ति सौ वर्षों तक जीवित रहने की आकांक्षा करे। स्वथ्य रहकर सत्कर्मों के द्वारा सौ वर्षों के जीवन का सदुपयोग करे, पर इस सौ वर्षों तक जीवित रहने की इच्छा का अर्थ क्या है ? इसमें भी एक सीमा है। इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति भूल से भी सदा-सर्वदा के लिए शरीर को जीवित रखने की आकांक्षा न पाल ले। क्योंकि व्यक्ति जब भी शरीर को अमर बना लेने का प्रयत्न करेगा, तो उसे जीवन में उसी प्रकार निराशा मिलेगी जैसा कि असुरों के साथ हुआ था।
Wednesday, 9 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रामचरितमानस में मानस-रोगों का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि व्यक्ति के जीवन में दुःख चार रूपों में आते हैं। रामराज्य के संदर्भ में गोस्वामीजी कहते हैं - रामराज्य में सब प्रकार के दुःखों का अभाव हो गया। कौन-कौन से ? - काल, कर्म, स्वभाव और गुणजन्य दुःखों का। वैसे तो गिनती में हजारों प्रकार के दुःख हैं, लेकिन उन समस्त को चार भागों में बाँटा जा सकता है। कुछ दुःख तो कालजन्य हैं, कुछ कर्मजन्य, कुछ गुणजन्य और कुछ स्वभावजन्य। ये चार प्रकार के दुःख हैं, जिनका वर्णन रामचरितमानस में मानस-रोग के अंतर्गत भिन्न-भिन्न रूपों में किया गया है। रामायण के विभिन्न प्रसंगों में विभिन्न पात्रों के माध्यम से इन दुःखों की उत्पत्ति का कारण और उसका समाधान प्रस्तुत किया गया है। अलग-अलग प्रकार के दुःख हैं, उनके लिए अलग-अलग प्रकार के समाधान के संकेत हैं। किस प्रकार के दुःख आने पर हमारे अन्तःकरण की भूमिका क्या होनी चाहिए ? किस प्रकार से उनका सामना करना चाहिए ? किस प्रकार उन पर विजय प्राप्त करना चाहिए ? इसे आने वाले दिनों में रामायण के दृष्टान्तों के माध्यम से देखेंगे।
Tuesday, 8 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
व्यक्ति का मन अगर रोगी है, तो ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वह सुखों से घिरे रहने पर भी सुखी नहीं रह पाता। अब ऐसे व्यक्ति के दुःख को दूर करने का क्या उपाय है ? गोस्वामीजी बड़ी अनोखी बात कहते हैं - दूसरों के सुख को देखकर जो दुःख होता है, वह अभावजन्य दुःख तो है नहीं, तो फिर यह कैसा दुःख है ? यह रोगजन्य दुःख है। मन के इस रोग की तुलना गोस्वामीजी शरीर के राजयक्ष्मा रोग से करते हैं। दूसरों के सुख को देखकर मन में जलन होना, यही मन का राजयक्ष्मा रोग है। कैसी विचित्र विडम्बना है ! व्यक्ति दुःख नहीं चाहता। सुखी रहना चाहता है और दूसरों का सुख देखकर जलना क्या है ? यह कोई अभावजन्य दुःख तो है नहीं, कह सकते हैं रोगजन्य दुःख है, पर उससे भी कहीं अधिक उपयुक्त होगा कि इसे स्वभावजन्य दुःख कहा जाय। व्यक्ति को सुख उपलब्ध होते हुए भी वह अपने स्वभाव के कारण अनजाने ही स्वयं दुःख की सृष्टि करता है। वस्तु का अभाव हो तो उसे वस्तु से दूर किया जा सकता है, पर स्वभावजन्य दुःख ? यदि स्वभाव ही हो दूसरों के सुख को देखकर दुखी हो जाना, तो इसे स्वभाव को बदलकर ही दूर किया जा सकता है।
Monday, 7 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
.....कल से आगे .......
जैसे घर में विभिन्न प्रकार के खाने की स्वादिष्ट वस्तुएँ हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति कुछ खा नहीं पाता और इसी कारण दुःखी रहता है। ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वस्तु होने पर भी उसका दुःख घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। क्योंकि यदि वे वस्तुएँ न हों तो क्षणभर के लिए संतोष कर ले कि वस्तुएँ ही नहीं हैं तो क्या करें ? पर जब वह देखता है कि दूसरे लोग हमारे सामने सुस्वादु व्यंजन का आनन्द ले रहे हैं और हम नहीं ले पा रहे हैं, तब वह जिस दुःख का अनुभव करता है, वह सचमुच बड़ा विचित्र प्रकार का दुःख है। यह अभावजन्य दुःख नहीं, बाध्यताजन्य दुःख है। इसे रामचरितमानस में कहा गया है - यदि शरीर रोगी है तो सारे भोग व्यर्थ हैं। अभिप्राय यह है कि अभावजन्य दुःख तो दूर होगा वस्तु की उपलब्धि से, लेकिन रोगजन्य दुःख ? वह तो उपलब्धि से नहीं, स्वथ्यता से दूर होगा। अगर रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाय, तो जो वस्तुएँ उसे प्राप्त हैं उनका आनंद लेने में वह समर्थ होगा। शरीर के संदर्भ में यह जितना सत्य है, उससे अधिक सत्य यह मन के संदर्भ में है। बल्कि यों कहें कि मन के संदर्भ में यह सबसे बड़ा सत्य है।
जैसे घर में विभिन्न प्रकार के खाने की स्वादिष्ट वस्तुएँ हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति कुछ खा नहीं पाता और इसी कारण दुःखी रहता है। ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वस्तु होने पर भी उसका दुःख घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। क्योंकि यदि वे वस्तुएँ न हों तो क्षणभर के लिए संतोष कर ले कि वस्तुएँ ही नहीं हैं तो क्या करें ? पर जब वह देखता है कि दूसरे लोग हमारे सामने सुस्वादु व्यंजन का आनन्द ले रहे हैं और हम नहीं ले पा रहे हैं, तब वह जिस दुःख का अनुभव करता है, वह सचमुच बड़ा विचित्र प्रकार का दुःख है। यह अभावजन्य दुःख नहीं, बाध्यताजन्य दुःख है। इसे रामचरितमानस में कहा गया है - यदि शरीर रोगी है तो सारे भोग व्यर्थ हैं। अभिप्राय यह है कि अभावजन्य दुःख तो दूर होगा वस्तु की उपलब्धि से, लेकिन रोगजन्य दुःख ? वह तो उपलब्धि से नहीं, स्वथ्यता से दूर होगा। अगर रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाय, तो जो वस्तुएँ उसे प्राप्त हैं उनका आनंद लेने में वह समर्थ होगा। शरीर के संदर्भ में यह जितना सत्य है, उससे अधिक सत्य यह मन के संदर्भ में है। बल्कि यों कहें कि मन के संदर्भ में यह सबसे बड़ा सत्य है।
Sunday, 6 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
मानस-रोग प्रसंग के प्रारंभ में ही एक सूत्र दिया गया है और वह यह है कि व्यक्ति के सामने अगर कोई सबसे बड़ी समस्या है तो वह सुख और दुःख की ही है। व्यक्ति सदा सुखी रहना चाहता है। वह समग्र सुख पाना चाहता है। वह चाहता है कि उसके जीवन में दुःख कभी न आये, पर ऐसी आकांक्षा होते हुए भी व्यक्ति के जीवन में अगणित दुःख आते रहते हैं। इन दुःखों का प्रमुख कारण क्या है ? गोस्वामीजी मनोरोगों को ही दुःखों का प्रमुख कारण बताते हैं। एक दुःख होता है वस्तु के अभाव में, जिसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। इस सत्य की स्वीकृति मानस में इन शब्दों में की गयी है - नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं। जहाँ तक व्यक्ति के जीवन में अभावजन्य दुःखों का प्रश्न है, व्यक्ति उन अभावों को दूर करके दुःख दूर करने का प्रयत्न कर सकता है, लेकिन मन तथा शरीर दोनों के संदर्भ में एक बात समान रूप से दिखाई देता है कि जब हम रूग्ण हो जाते हैं, तब हमारा रोग अभावजन्य नहीं रह जाता।
.......आगे कल ........
.......आगे कल ........
Saturday, 5 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
......कल से आगे ......
जब बुद्धि के द्वारा दोषों का समर्थन किया जाता है, तब व्यक्ति समझता है कि लोभ के साथ जीवन में व्यक्ति और समाज की बहुत सी आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए लोभ करना चाहिए और कोई दूसरा हमारी वस्तु को छीन न ले, इसलिए निरन्तर दूसरों को ढकेलते रहना चाहिए। ये वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समाज में व्याप्त हैं और जब हम बुद्धि के द्वारा इनका समर्थन करते हैं, तब यह रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए स्वथ्यता के मूल में सत्य यह है कि पहले हम बुद्धि के द्वारा समझें यह रोग है, यह दोष है, यह बुराई है, तभी उसकी चिकित्सा होगी।
जब बुद्धि के द्वारा दोषों का समर्थन किया जाता है, तब व्यक्ति समझता है कि लोभ के साथ जीवन में व्यक्ति और समाज की बहुत सी आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए लोभ करना चाहिए और कोई दूसरा हमारी वस्तु को छीन न ले, इसलिए निरन्तर दूसरों को ढकेलते रहना चाहिए। ये वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समाज में व्याप्त हैं और जब हम बुद्धि के द्वारा इनका समर्थन करते हैं, तब यह रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए स्वथ्यता के मूल में सत्य यह है कि पहले हम बुद्धि के द्वारा समझें यह रोग है, यह दोष है, यह बुराई है, तभी उसकी चिकित्सा होगी।
Friday, 4 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
मंथरा अपने पक्ष में धर्म की ही आढ़ लेते हुए कहती है कि भरत को राज्य दिलाना मेरा धर्म है और भरत के राज्य को सुरक्षित रखने के लिए राम को वन भेज देना मेरी विशेष बुद्धिमता है। इस तरह उसने अपनी ईर्ष्यावृत्ति को समर्थन कर लिया। पहले लोभ, उसके बाद ईर्ष्या, फिर दूसरे के सुख को मिटाने के लिए कुटिल वृत्ति और उसका बुद्धि द्वारा समर्थन। इस तरह उसका रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए मंथरा की स्वथ्यता के बारे में आगे चलकर कुछ नहीं कहा गया है। कैकेयी तो बाद में स्वस्थ हो जाती है, पर मंथरा कभी स्वस्थ हुई यह नहीं कहा गया। इसका सांकेतिक तात्पर्य यह है कि कैकेयी की बुद्धि में दुर्बलताएँ अवश्य हैं, पर अन्त में उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर ली और वे स्वस्थ हो गयीं, पर मंथरा तो कभी भी नहीं समझ पायी कि उससे कोई भूल हो रही है। जब शत्रुध्नजी उसकी चोटी पकड़कर घसीटने लगे, तो मंथरा ने यह नहीं कहा कि मुझसे भूल हो गया, बल्कि उसने शत्रुध्नजी से यही कहा कि मैं तो भला करने चली थी और मेरे साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि
........आगे कल........
........आगे कल........
Thursday, 3 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
मंथरा को श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार मिला। बुद्धि तो उलटी हुई ही है। अब उसकी वह उलटी बुद्धि बड़ी तीव्रता से सक्रिय हो गयी। उसमें बड़ा पैनापन आ गया। राम को राज्य मिलेगा। राम कितने प्रसन्न होंगे, कौसल्या कितनी प्रसन्न होगी। बस, ह्रदय जलने लगा। तब उसने सोचा कि नहीं, ऐसा नहीं होने दूँगी। राम का राज्याभिषेक नहीं होने दूँगी और वह ऐसा क्यों नहीं होने देना चाहती ? उसकी युक्ति और तर्क देखिए। बुद्धि जब विकृत होती है तो वह निष्क्रिय नहीं, बल्कि अधिक सक्रिय हो उठती है और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र, धर्म और ईश्वर सबका उपयोग कर लेती है। वह धर्म की एक नयी और अद्भुत व्याख्या कर लेती है। वह कहती है कि मैं रामराज्य में बाधा उपस्थित करके कोई अधर्म थोड़े ही कर रही हूँ। मैं तो अपने धर्म का पालन कर रही हूँ। मैं कैकेयी की दासी हूँ। सेवक का धर्म यही है कि वह स्वामी के हित की रक्षा करे। मेरे रहते मेरी स्वामिनि की इतनी उपेक्षा ? कैकेयी के पुत्र को छोड़कर कौसल्या के पुत्र को राज्य मिले, तो फिर मैं किस दिन काम आऊँगी ? महाराज ने तो मुझे भेजा ही इसलिए है कि विशेष रूप से मैं निरन्तर सजग रहकर कैकेयी के हितों की रक्षा करूँ। इसलिए मैं जो कुछ कर रही हूँ, वह धर्मसंगत और न्यायसंगत है।
Wednesday, 2 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि महाराज ! आप स्वर्ग की इतनी निन्दा क्यों करते हैं ? तो उन्होंने कहा कि स्वर्ग में सारे भोग तो मिल जाते हैं, पर एक समस्या वहाँ भी बनी रहती है। क्या ? स्वर्ग में भी सौतिया डाह नहीं मिटती। अपने अगल-बगल वालों को देखते हैं कि उसके पास कितनी अप्सराएँ और कितने भोग हैं। उसकी तुलना में हमारे पास कितना कम है तब दूसरों से ईर्ष्या होती है। लोभ में तो अपने ही सुख की लालसा है, पर दूसरों के सुख को देखकर जो हमारे अन्तःकरण में जलन हो रही है, इस दुःख का क्या इलाज है ? तब वह सुखी व्यक्ति को दुखी बनाने की चेष्टा करता है। यही क्रम मंथरा के जीवन में दिखाई देगा।
Tuesday, 1 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
कैकेयी और मंथरा के संदर्भ में मूल कारण किसको कहा गया है ? देवताओं ने बुद्धि की देवी सरस्वती से निवेदन किया कि वे किसी तरह कैकेयी और मंथरा की बुद्धि को उलट दें। इसका अभिप्राय क्या है ? अच्छे और बुरे का निर्णय कौन करती है ? बुद्धि। और जिसकी बुद्धि ही उलट दी जाय, तो उसे सब उलटा दिखेगा। अच्छाई में बुराई और बुराई में अच्छाई दिखायी देने लगेगी। कैकेयी और मंथरा के जीवन में यही क्रम आपको दिखायी देगा। यह मंथरा कौन है ? मंथरा लोभ की प्रतीक है। लोभ से उसकी बुद्धि विकृत हो गयी है। पहले अपने लिए संग्रह, उसके बाद दूसरे के सुख को देखकर जलन। जब तक अपने सुख के लिए संग्रह का लोभ है, तब तक लोभ साध्य है ; पर जब दूसरों का सुख देखकर ईर्ष्या होने लगती है, तब वह कितना बड़ा अनर्थ कर बैठती है, यह मंथरा के जीवन में दिखायी देता है।
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