Wednesday, 9 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामचरितमानस में मानस-रोगों का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि व्यक्ति के जीवन में दुःख चार रूपों में आते हैं। रामराज्य के संदर्भ में गोस्वामीजी कहते हैं - रामराज्य में सब प्रकार के दुःखों का अभाव हो गया। कौन-कौन से ? - काल, कर्म, स्वभाव और गुणजन्य दुःखों का। वैसे तो गिनती में हजारों प्रकार के दुःख हैं, लेकिन उन समस्त को चार भागों में बाँटा जा सकता है। कुछ दुःख तो कालजन्य हैं, कुछ कर्मजन्य, कुछ गुणजन्य और कुछ स्वभावजन्य। ये चार प्रकार के दुःख हैं, जिनका वर्णन रामचरितमानस में मानस-रोग के अंतर्गत भिन्न-भिन्न रूपों में किया गया है। रामायण के विभिन्न प्रसंगों में विभिन्न पात्रों के माध्यम से इन दुःखों की उत्पत्ति का कारण और उसका समाधान प्रस्तुत किया गया है। अलग-अलग प्रकार के दुःख हैं, उनके लिए अलग-अलग प्रकार के समाधान के संकेत हैं। किस प्रकार के दुःख आने पर हमारे अन्तःकरण की भूमिका क्या होनी चाहिए ? किस प्रकार से उनका सामना करना चाहिए ? किस प्रकार उन पर विजय प्राप्त करना चाहिए ? इसे आने वाले दिनों में रामायण के दृष्टान्तों के माध्यम से देखेंगे।

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