गीता और रामायण दोनों का दर्शन यही है। गीता में भगवान अर्जुन को इसी सत्य का साक्षात्कार कराते हैं। महाभारत के रणांगन में उन समस्त योद्धाओं को किसने मारा ? मारा तो भगवान ने। क्योंकि भगवान ने अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन कराया, तो उसमें अर्जुन ने देखा कि सारे योद्धा मरे पड़े हैं। अर्जुन ने पूछा कि महाराज! इन्हें मारा किसने ? भगवान बोले , मैंने। तो अब मुझे नहीं मारना पड़ेगा। बोले कि नहीं, पर लड़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा। मैंने भले ही इन्हें पहले से ही मार दिया है, पर युद्ध तो तुम्हें ही करना है और यही भगवान की प्रेरणा है। कर्म तुम करो, पर परिणाम तो मैं ही दूँगा। लड़ना कर्म है और अन्त में परिणाम विजय है। अगर मैं जीव से कह दूँ कि तुम मत लड़ो, तब तो वह तमोगुणी और निष्क्रिय हो जायेगा और यदि वह यह जान ले कि विजय भी उसके बस की बात है, तो उसके अन्तःकरण में अभिमान आ जायेगा।
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