Friday, 18 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

जब भगवान गीधराज से यह प्रस्ताव करते हैं - मेरे विचार से आप कुछ दिन और जीवित रहें। आप इस पुत्र की सेवा का सुख देखें और मुझे पिता का आनन्द दें। गोस्वामीजी ने यहाँ बड़ी अनोखी बात कही है। ईश्वर सच्चिदानन्द है, आनन्दघन है और जीव के जीवन में हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि लगे रहते हैं, परन्तु यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है - ईश्वर रो रहे हैं और जीव हँस रहा है। इससे बढ़कर विचित्र दृश्य और क्या होगा ? भगवान राम आँसू बहा रहे हैं और गीधराज जिनके पंख कटे हुए हैं, इतने कष्ट में हैं, भगवान उनसे जीवित रहने का प्रस्ताव करते हैं। सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। भगवान का प्रस्ताव उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इसका तात्पर्य क्या है ? प्रभु श्रीराम ने कहा कि आप कुछ दिन और जीवित रहिए। इसका अर्थ है कि उसके बाद मरिए। तो कभी न कभी मरना ही पड़ेगा। मृत्यु तो अवश्सम्भावी है, तो फिर आज मैं इस सार्थक मृत्यु को क्यों छोड़ दूँ ? इस शरीर का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सकता था, वह हो गया। पवित्र कार्य में मेरा शरीर उत्सर्ग हो गया और इस समय मुझे आपका दर्शन हो रहा है। जिनका नाम स्मरण करना भी कठिन है, उनका साक्षात दर्शन हो रहा है। ऐसी विलक्षण मृत्यु को छोड़ दूँ, तो मुझसे बढ़कर अभागा और कौन होगा ?

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