Sunday, 27 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

भगवान सुग्रीव को भी इसी प्रसंग में शिक्षा देते हैं। भगवान ने जब बालि को मारने की प्रतिज्ञा की तो सुग्रीव के मन में क्षणिक ज्ञान-वैराग्य आ गया। उन्होंने भगवान राम से कहा कि महाराज ! मैं तो समझता हूँ कि यह संसार मिथ्या है और अब मेरे मन में कोई भेद नहीं रह गया है। इसलिए अब ऐसी कृपा कीजिए कि सब कुछ छोड़कर मैं आपका भजन करूँ। भगवान को बड़ी हँसी आयी कि कहाँ तो मैं वेदांत के ब्रह्मपद को छोड़कर भक्तों के लिए अवतार लेकर आया हूँ, पक्षपाती बना हूँ और ये बन गये वेदान्ती। बड़ी विचित्र बात है, कह रहे हैं कि शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं रह गया। भगवान ने कहा कि जरा कसौटी पर कसकर देखें कि इसका ज्ञान-वैराग्य कितना पक्का है। बाद में बालि का मुक्का पड़ा। भगवान तो यही परीक्षा ले रहे थे कि मुक्का पड़ने पर भी अगर वैराग्य बना रहता है, तब तो वह पक्का है, पर उस मुक्के से सुग्रीव का ज्ञान-वैराग्य हवा हो गया। वास्तव में वह तो क्षणिक वैराग्य था। जब लौटकर आये तो भगवान ने कहा कि क्या करूँ ? इसमें भगवान का एक दूसरा व्यंग्य यह भी था कि भई ! एक वेदान्ती तो तुम्हारा भाई बालि है, जो कह रहा है कि ब्रह्म सम है और दूसरे वैराग्यवान तुम हो, जिसकी दृष्टि में शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं है। तो मैं भी ऐसे दो महान ज्ञानी और वैरागी में भला भेद क्यों करूँ ? तुम दोनों का हाल बिल्कुल एक जैसा है। इसलिए मैंने तुम दोनों के बीच हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया, पर सुग्रीव के चरित्र में यही एक अच्छा पक्ष है कि वे अपनी भूल को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। कहते हैं - प्रभु ! यह मेरा भाई नहीं, शत्रु है, मेरा काल है, मेरी रक्षा कीजिए। सुग्रीव तुरन्त ज्ञानी से भक्त बन गये और श्रीराम वेदांत के ब्रह्म से भक्त के भगवान बन गये।

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