Saturday, 19 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

दो शब्द हैं - मुक्ति और जीवनमुक्ति। मुक्ति तो रावण की भी हुई, पर कब ? जब उसके शरीर का नाश हुआ। इसका अभिप्राय यह है कि उसने अपने को शरीर की सीमा में घेर रखा था। शरीर से अलग होने पर ही रावण मुक्त हुआ, पर गीधराज की विशेषता यह है कि जीवित रहते हुए भी शरीर में रहते हुए भी वे मुक्त हैं, क्योंकि शरीर के बंधन को उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया। उन्होंने भगवान से कह दिया कि अब इस शरीर को रखने की आवश्यकता नहीं है। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि एक ओर तो मृत्यु का विजेता रावण है, जो मृत्यु का ग्रास होने जा रहा है और दूसरी ओर मृत्यु का ग्रास बन जाने वाले गीधराज हैं, जो मृत्यु के पूर्व ही मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे जानते हैं कि शरीर तो नाशवान है, अनित्य है। नित्य और अनित्य के भेद को जान लेने के कारण अपने विवेक से उन्होंने काल के दुःख को जीत लिया। इसलिए उनके होंठों पर हँसी आ गयी। सामने मृत्यु खड़ी होने पर भी उन्हें दुःख नहीं है।

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