ईश्वर समदर्शी तो है, पर इस ज्ञान की प्रतिक्रिया या फल हमारे जीवन में क्या होना चाहिए ? यह होना चाहिए कि ब्रह्म समदर्शी है और हम ब्रह्म के अंश हैं। जीव ब्रह्म से अभिन्न है, ऐसा बोध होने पर अगर हमारे अन्तःकरण में समत्व आ जाय तो ब्रह्म के समत्व का ज्ञान बड़ा सार्थक और कल्याणकारी हो, पर यदि हम उल्टा अर्थ ले लें, तब तो यह समत्व का ज्ञान बड़ा खतरनाक है। क्यों ? पता चल गया कि भगवान सम है, पाप और पुण्य, दोनों में तटस्थ है तो प्रसन्न हो गये कि खूब पाप करो, क्योंकि जब वे सम हैं तब तो वे पाप और पुण्य में भेद करेंगे नहीं। बालि ने यही अर्थ लिया। भगवान अगर सम हैं तो मैं सुग्रीव पर प्रहार करता रहूँगा और भगवान देखते रहेंगे। इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्म के समत्व का ज्ञान अगर किसी व्यक्ति को समाज में अत्याचारी बना दे और उस समत्व ज्ञान की आड़ में व्यक्ति मनमाना आचरण करने लगे तो उसका क्या परिणाम होगा ? उसका परिणाम दिखाई देता है बालि के जीवन में।
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