......कल से आगे ......
जब बुद्धि के द्वारा दोषों का समर्थन किया जाता है, तब व्यक्ति समझता है कि लोभ के साथ जीवन में व्यक्ति और समाज की बहुत सी आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए लोभ करना चाहिए और कोई दूसरा हमारी वस्तु को छीन न ले, इसलिए निरन्तर दूसरों को ढकेलते रहना चाहिए। ये वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समाज में व्याप्त हैं और जब हम बुद्धि के द्वारा इनका समर्थन करते हैं, तब यह रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए स्वथ्यता के मूल में सत्य यह है कि पहले हम बुद्धि के द्वारा समझें यह रोग है, यह दोष है, यह बुराई है, तभी उसकी चिकित्सा होगी।
जब बुद्धि के द्वारा दोषों का समर्थन किया जाता है, तब व्यक्ति समझता है कि लोभ के साथ जीवन में व्यक्ति और समाज की बहुत सी आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए लोभ करना चाहिए और कोई दूसरा हमारी वस्तु को छीन न ले, इसलिए निरन्तर दूसरों को ढकेलते रहना चाहिए। ये वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समाज में व्याप्त हैं और जब हम बुद्धि के द्वारा इनका समर्थन करते हैं, तब यह रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए स्वथ्यता के मूल में सत्य यह है कि पहले हम बुद्धि के द्वारा समझें यह रोग है, यह दोष है, यह बुराई है, तभी उसकी चिकित्सा होगी।
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