Tuesday, 29 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

सुग्रीव के जीवन में भगवान ने अपने दो रूपों का परिचय दिया, लेकिन बालि के सामने उन्होंने तीन रूपों का परिचय दिया। भगवान बालि के सामने नहीं गये, उन्होंने वृक्ष की आड़ से बाण चलाया। इसका अभिप्राय क्या है ? भगवान यह बताना चाहते थे कि कर्मसिद्धान्त का जो ईश्वर है, वह बिना सामने आये ही बाण चलाता है। भगवान का बाण क्या है ? गोस्वामीजी लंकाकाण्ड के प्रारंभ में कहते हैं - काल का धनुष, समय का बाण और उसको चलाने वाला है ईश्वर। यह ईश्वर छिपा हुआ है। सामने प्रत्यक्ष नहीं है। वृक्ष की आड़ में बाण चलाता है। यह वृक्ष क्या है ? वृक्ष की व्याख्या गोस्वामीजी ने विनयपत्रिका में की है - संसार एक घनघोर वन है और व्यक्ति के कर्म ही उसके वृक्ष हैं और इसका तात्पर्य यह है कि कर्मसिद्धान्त की मान्यता है कि ईश्वर कर्म का फल कर्म की आड़ से देता है। वह कालरूपी धनुष-बाण के माध्यम से जीव को कर्म का फल देता है। कर्म का फल देने वह प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता। कर्मसिद्धान्त में यही ईश्वर का स्वरूप है। इसलिए जब बालि ने पूछा कि आपने मुझे छिपकर क्यों मारा ? सामने क्यों नहीं आये ? तो प्रभु ने कहा कि जब तुम कर्मसिद्धान्त को मानते हो और मुझे ईश्वर समझते हो, तो धर्मशास्त्र में तो यही कहा गया है कि ईश्वर कर्म की आड़ में फल देता है। वह फल देने के लिए प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता। अतः मैंने तुम्हें कर्म की आड़ से तुम्हारे कर्म का फल दिया।

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