रामायण में बड़ी अच्छी बात कही गयी है। विभिषण ने भगवान राम से कहा कि प्रभो ! रावण यज्ञ कर रहा है। तो यह तो बड़ी अच्छी बात है। जो यज्ञ नष्ट करता था, अब वह यज्ञ कर रहा है, पर विभिषण आगे कहते हैं - अगर उसका यज्ञ सिद्ध हो गया, तो वह अभागा मरेगा नहीं। पढ़कर बड़ा विचित्र लगता है। नहीं मरेगा तो भाग्यवान है कि अभागा है ? कोई चिरायु होता है तो लोग कहते हैं कि वह बड़ा भाग्यवान है। कोई अल्पायु होता है तो कहते हैं, उसका भाग्य अल्प था, पर विभिषण बड़ी सार्थक बात कहते हैं। विभिषण के कहने का अभिप्राय यह है कि जिस मृत्यु से मनुष्य को मुक्ति मिलने वाली है, उस मृत्यु को टालते जाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे बढ़कर दुर्भाग्य रावण का और क्या होगा कि मुक्तिदाता के रूप में साक्षात श्रीराम खड़े हैं और रावण को शरीर से मुक्त करना चाहते हैं, पर रावण तो उस देह के बंधन में और अधिक बँधता जा रहा था। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की पराकाष्ठा रावण के लिए और क्या होगी ?
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