Wednesday, 16 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

तुलसीदासजी से किसी ने पूछा कि घोड़े पर बैठे हुए श्रीराम को देखने के लिए कौन-कौन आया ? तो उन्होंने कहा कि भई ! श्रीराम की इस झाँकी का दर्शन करने के लिए वैसे तो देवता, मुनि तथा मनुष्य आदि सभी आये, किन्तु सबसे विशेष बात यह है कि प्रभु के इस रूप का साक्षात्कार करने के लिए भगवान शंकर भी आये जो कि सर्वदा समाधि में लीन रहते हैं। गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि भगवान शंकर ने विचार किया कि अब इस मन को एकाग्र करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जब भगवान को भी चंचल घोड़े की आवश्यकता है तो फिर हम इस चंचल को अचंचल क्यों बनायें ? आगे अश्व का वर्णन करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि यह कोई साधारण घोड़ा नहीं है। अपितु यह तो साक्षात कामदेव ही घोड़े के वेश बनाकर प्रभु की सेवा में आ गया है। गोस्वामीजी इस प्रसंग के माध्यम से मानो यह बताना चाहते हैं कि जिस काम ने आज तक संसार पर शासन किया, उस मनोज की लगाम हमें ईश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। हमारे अन्तःकरण में यदि कहीं यह दूल्हा सचमुच आ जाये, तथा आकर हमारे मन और मनोज के घोड़े पर बैठ उसकी लगाम को कसकर पकड़ ले तो हमारे अन्तःकरण की चंचलता का भी सदुपयोग हो सकता है।

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