Friday, 11 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

रामचरितमानस में एक ओर रावण जैसा पात्र है, जो शरीर को अमर बनाने की चेष्टा करता है और अन्त में मृत्यु का ग्रास बन जाता है। इतना ही नहीं, बल्कि जिस शरीर को रावण अमर बना लेना चाहता है, उस शरीर की अन्तिम परिणति क्या है ? उस ओर इंगित करते हुए बड़ी सांकेतिक भाषा में कहा गया है कि लंका का रणांगन रावण के शिर और भुजाओं से पटा पड़ा है। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि रावण ने अमरता का अर्थ ले लिया शरीर की अमरता से और भगवान शंकर को शिर चढ़ाकर उनसे यह वरदान प्राप्त कर लिया कि शिर कटने के बाद फिर नया शिर निकल आये। यह वरदान पाकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ और सोचने लगा कि अब तो मैंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लिया, काल की समस्या का समाधान मिल गया। क्योंकि व्यक्ति के शिर कटने पर उसकी मृत्यु हो जाती है, पर मेरा शिर कटने पर नया शिर निकल आयेगा और मेरी मृत्यु नहीं होगी, लेकिन रावण का गणित उल्टा सिद्ध हुआ। रावण जब भगवान से युद्ध करता है तो भगवान उसका शिर काट देते हैं, पर जैसे ही उसका शिर कटता, एक नया शिर निकल आता। रावण पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ? उसने कहा कि बस, राम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। अधिक से अधिक यह शिर ही काट सकता है, पर शिर काटने से तो मैं मरा नहीं, मेरा नया शिर निकल आया, तब इस मूढ़ता के कारण रावण के शव की ऐसी दुर्दशा हुई, वैसी तो सारी सृष्टि में साधारण से साधारण व्यक्ति की भी नहीं होती। लंका का सारा रणांगन रावण के शिर और भुजाओं से पट गया। मंदोदरी बड़े दुखपूर्वक देखती है कि चील-गीध मँडरा रहे हैं, सियार-कुत्ते दौड़ रहे हैं और रावण के शिर और भुजाओं को नष्ट कर रहे हैं। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि शरीर तो अनित्य है ही, पर उसे अमर बनाने की चेष्टा में उसकी अन्तिम परिणिति अतीव विभत्स हो सकती है, बड़ी दुर्गति हो सकती है। रावण के लिए वरदान भी अभिशाप बन गया।

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