आज अगहन मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी है, कल पंचमी भगवान श्री सीताराम का विवाह है, इसलिए विषयांतर होते हुए आइये परम पूज्य गुरुदेव भगवान की दृष्टि से विवाह प्रसंग में प्रवेश करें -
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
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