Sunday, 20 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

बालि ने अनेक राक्षसों को मारा, लेकिन उसकी विजय संसार के लिए कल्याणकारी न होकर उसके अहंकार को बढ़ाने वाली ही होती थी। इससे संबंधित एक सांकेतिक कथा है। ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते थे। उनसे प्रभु ने पूछा कि बालि जब सर्वत्र तुम्हारा पीछा करता रहा, तो यहाँ क्यों नहीं आया ? सुग्रीव ने बताया कि बालि को शाप है कि वह इस पर्वत पर नहीं आ सकेगा। यह बड़ी सांकेतिक कथा है। दुन्दुभि नाम के एक राक्षस ने बालि को चुनौती दी थी। बालि ने युद्ध में उसे मार डाला। इसी प्रसंग में मुनियों ने उसे शाप दिया था। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की बात क्या हो सकती है ? राक्षस का नाश करने वाले को मुनियों से साधुवाद और आशीर्वाद मिलना चाहिए या शाप ? पर कथा बड़ी सांकेतिक है। राक्षस को मारने के बाद तो बालि को आशीर्वाद अवश्य मिला होता, पर राक्षस को मारने के बाद उसने जो किया, वह उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो गया। क्यों ? बालि ने सोचा कि मैंने दुन्दुभि को मार तो डाला, पर देखा किसने ? तो ऐसा करें कि जरा लोग देखें। ऋष्यमूक पर्वत पर बहुत से ऋषि-मुनि रहते थे। इस शव को वहीं फेंक दें, ताकि लोग देख लें कि हमने कितनी बड़ी विजय पायी है। और उसने दुन्दुभि का शव उठाकर ऋषि-मुनियों के आश्रम में फेंक दिया। परिणाम क्या हुआ ? मुनियों का सारा आश्रम अपवित्र हो गया। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने शाप दे दिया कि जिस व्यक्ति ने ऐसा किया है, वह यदि इस पर्वत पर आयेगा तो उसकी मृत्यु हो जायेगी। बड़ा सूक्ष्म संकेत है। सत्कर्म में अगर दम्भ और अभिमान सम्मिलित हो जाय, व्यक्ति अगर सत्कर्म को भी प्रदर्शन की वस्तु बना ले, तब क्या होगा ? जो लोग सत्कर्म करके दिखावा करते हैं, वे अन्यत्र तो सम्मान प्राप्त करने के अधिकारी हैं, पर ऋष्यमूक पर्वत पर जाने के अधिकारी नहीं हैं। वे तो वस्तुतः शाप और मृत्यु के ग्रास बनने के अधिकारी हैं।

No comments:

Post a Comment