एक प्रकार का दुःख है मृत्यु, जिसे हम कालजन्य दुःख कह सकते हैं। वैसे तो काल शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है, पर दृष्टांत के लिए यहाँ समझें कि कालकृत दुःख का अभिप्राय है मृत्यु का दुःख। अब इस दुःख पर विचार करें। मृत्यु अवश्सम्भावी है। जन्म लेने पर मृत्यु अवश्य होगी। यह अत्यंत स्वाभाविक है। इससे बचा नहीं जा सकता। इस दुःख को दूर करने का प्रयास व्यक्ति दो प्रकार से कर सकता है। एक तरह से रावण ने भी इस दुःख पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किया। यह असुरों की पद्धति है। असुरों ने सोचा कि अगर हम अमर हो जायँ, हमारा शरीर अमर हो जाय, तो हम काल पर विजय प्राप्त कर लेंगे। शरीर को अमर बनाने के लिए स्वस्थ रहने का प्रयत्न करें। वेदों में भी कहा गया कि व्यक्ति सौ वर्षों तक जीवित रहने की आकांक्षा करे। स्वथ्य रहकर सत्कर्मों के द्वारा सौ वर्षों के जीवन का सदुपयोग करे, पर इस सौ वर्षों तक जीवित रहने की इच्छा का अर्थ क्या है ? इसमें भी एक सीमा है। इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति भूल से भी सदा-सर्वदा के लिए शरीर को जीवित रखने की आकांक्षा न पाल ले। क्योंकि व्यक्ति जब भी शरीर को अमर बना लेने का प्रयत्न करेगा, तो उसे जीवन में उसी प्रकार निराशा मिलेगी जैसा कि असुरों के साथ हुआ था।
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