Tuesday, 8 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

व्यक्ति का मन अगर रोगी है, तो ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वह सुखों से घिरे रहने पर भी सुखी नहीं रह पाता। अब ऐसे व्यक्ति के दुःख को दूर करने का क्या उपाय है ? गोस्वामीजी बड़ी अनोखी बात कहते हैं - दूसरों के सुख को देखकर जो दुःख होता है, वह अभावजन्य दुःख तो है नहीं, तो फिर यह कैसा दुःख है ? यह रोगजन्य दुःख है। मन के इस रोग की तुलना गोस्वामीजी शरीर के राजयक्ष्मा रोग से करते हैं। दूसरों के सुख को देखकर मन में जलन होना, यही मन का राजयक्ष्मा रोग है। कैसी विचित्र विडम्बना है ! व्यक्ति दुःख नहीं चाहता। सुखी रहना चाहता है और दूसरों का सुख देखकर जलना क्या है ? यह कोई अभावजन्य दुःख तो है नहीं, कह सकते हैं रोगजन्य दुःख है, पर उससे भी कहीं अधिक उपयुक्त होगा कि इसे स्वभावजन्य दुःख कहा जाय। व्यक्ति को सुख उपलब्ध होते हुए भी वह अपने स्वभाव के कारण अनजाने ही स्वयं दुःख की सृष्टि करता है। वस्तु का अभाव हो तो उसे वस्तु से दूर किया जा सकता है, पर स्वभावजन्य दुःख ? यदि स्वभाव ही हो दूसरों के सुख को देखकर दुखी हो जाना, तो इसे स्वभाव को बदलकर ही दूर किया जा सकता है।

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