रावण की तरह असुरों की भाँति अगर कोई व्यक्ति काल को जितने की चेष्टा करेगा तो वह कालजन्य दुःख को कभी नहीं जीत पायेगा। कालजन्य दुःख को जीतने में विवेक ही सहायक है। जिस व्यक्ति में विवेक है, वही कालजन्य दुःख से बच सकता है। इसलिए रामचरितमानस में सर्वत्र यह संकेत दिया गया है कि कालजन्य दुःख पर विजय पाने के लिए देह को अमर बनाने की चेष्टा सही उपाय नहीं है, वह तो देहासक्ति से ऊपर उठकर ही प्राप्त की जा सकती है। इस प्रयास में जहाँ रावण के जीवन में असफलता दिखाई देती है, वहीं रामायण के ऐसे दो पात्र हैं, जिनके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वे जीवित रहें, पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। वे दो पात्र हैं गीधराज जटायु और बालि।
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