भगवान ने बड़ा अनोखा कार्य किया था। बालि की छाती पर जब बाण लगा और वह गिर पड़ा, तब प्रभु उसके सामने आ गये। यह उनकी कृपा का स्वरूप है। सामने आना कोई आवश्यक नहीं था। कर्म का फल दे दिया, वृक्ष की आड़ में खड़े रहते और बालि की मृत्यु हो जाती। भगवान का चुनाव भी बड़ा अद्भुत होता है। बालि के शिर पर बाण नहीं मारा। उसका शिर नहीं काटा। ह्रदय पर बाण मारा - यह सांकेतिक भाषा है। इसका अभिप्राय क्या है ? भगवान ने सोचा कि इसका शिर तो ठीक है अर्थात बुद्धि ठीक है, बातें तो ज्ञान की करता है, पर ह्रदय में अभिमान है। अभिमान नष्ट करना है, इसलिए ह्रदय पर बाण मारा और जैसे ही अभिमान नष्ट हुआ, वे प्रकट हो गये। अब वे वेदांत के ब्रह्म और कर्मसिद्धान्त के ईश्वर नहीं, बल्कि कृपालु ईश्वर भक्तों के भगवान के रूप में प्रकट हो गये। ये ईश्वर भक्तों के लिए अवतरित होते हैं, मनुष्यरूप में अवतार लेते हैं। बालि ज्यों ही गिरा। भगवान राघवेन्द्र तुरंत सामने प्रकट हो गये।
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