मंथरा अपने पक्ष में धर्म की ही आढ़ लेते हुए कहती है कि भरत को राज्य दिलाना मेरा धर्म है और भरत के राज्य को सुरक्षित रखने के लिए राम को वन भेज देना मेरी विशेष बुद्धिमता है। इस तरह उसने अपनी ईर्ष्यावृत्ति को समर्थन कर लिया। पहले लोभ, उसके बाद ईर्ष्या, फिर दूसरे के सुख को मिटाने के लिए कुटिल वृत्ति और उसका बुद्धि द्वारा समर्थन। इस तरह उसका रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए मंथरा की स्वथ्यता के बारे में आगे चलकर कुछ नहीं कहा गया है। कैकेयी तो बाद में स्वस्थ हो जाती है, पर मंथरा कभी स्वस्थ हुई यह नहीं कहा गया। इसका सांकेतिक तात्पर्य यह है कि कैकेयी की बुद्धि में दुर्बलताएँ अवश्य हैं, पर अन्त में उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर ली और वे स्वस्थ हो गयीं, पर मंथरा तो कभी भी नहीं समझ पायी कि उससे कोई भूल हो रही है। जब शत्रुध्नजी उसकी चोटी पकड़कर घसीटने लगे, तो मंथरा ने यह नहीं कहा कि मुझसे भूल हो गया, बल्कि उसने शत्रुध्नजी से यही कहा कि मैं तो भला करने चली थी और मेरे साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि
........आगे कल........
........आगे कल........
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