.....कल से आगे .......
जैसे घर में विभिन्न प्रकार के खाने की स्वादिष्ट वस्तुएँ हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति कुछ खा नहीं पाता और इसी कारण दुःखी रहता है। ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वस्तु होने पर भी उसका दुःख घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। क्योंकि यदि वे वस्तुएँ न हों तो क्षणभर के लिए संतोष कर ले कि वस्तुएँ ही नहीं हैं तो क्या करें ? पर जब वह देखता है कि दूसरे लोग हमारे सामने सुस्वादु व्यंजन का आनन्द ले रहे हैं और हम नहीं ले पा रहे हैं, तब वह जिस दुःख का अनुभव करता है, वह सचमुच बड़ा विचित्र प्रकार का दुःख है। यह अभावजन्य दुःख नहीं, बाध्यताजन्य दुःख है। इसे रामचरितमानस में कहा गया है - यदि शरीर रोगी है तो सारे भोग व्यर्थ हैं। अभिप्राय यह है कि अभावजन्य दुःख तो दूर होगा वस्तु की उपलब्धि से, लेकिन रोगजन्य दुःख ? वह तो उपलब्धि से नहीं, स्वथ्यता से दूर होगा। अगर रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाय, तो जो वस्तुएँ उसे प्राप्त हैं उनका आनंद लेने में वह समर्थ होगा। शरीर के संदर्भ में यह जितना सत्य है, उससे अधिक सत्य यह मन के संदर्भ में है। बल्कि यों कहें कि मन के संदर्भ में यह सबसे बड़ा सत्य है।
जैसे घर में विभिन्न प्रकार के खाने की स्वादिष्ट वस्तुएँ हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति कुछ खा नहीं पाता और इसी कारण दुःखी रहता है। ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वस्तु होने पर भी उसका दुःख घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। क्योंकि यदि वे वस्तुएँ न हों तो क्षणभर के लिए संतोष कर ले कि वस्तुएँ ही नहीं हैं तो क्या करें ? पर जब वह देखता है कि दूसरे लोग हमारे सामने सुस्वादु व्यंजन का आनन्द ले रहे हैं और हम नहीं ले पा रहे हैं, तब वह जिस दुःख का अनुभव करता है, वह सचमुच बड़ा विचित्र प्रकार का दुःख है। यह अभावजन्य दुःख नहीं, बाध्यताजन्य दुःख है। इसे रामचरितमानस में कहा गया है - यदि शरीर रोगी है तो सारे भोग व्यर्थ हैं। अभिप्राय यह है कि अभावजन्य दुःख तो दूर होगा वस्तु की उपलब्धि से, लेकिन रोगजन्य दुःख ? वह तो उपलब्धि से नहीं, स्वथ्यता से दूर होगा। अगर रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाय, तो जो वस्तुएँ उसे प्राप्त हैं उनका आनंद लेने में वह समर्थ होगा। शरीर के संदर्भ में यह जितना सत्य है, उससे अधिक सत्य यह मन के संदर्भ में है। बल्कि यों कहें कि मन के संदर्भ में यह सबसे बड़ा सत्य है।
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