Tuesday, 22 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

पहले भगवान श्री राघवेन्द्र सुग्रीव को बालि से लड़ने भेजते हैं। वहाँ भी बड़ी अनोखी दार्शनिक और मधुर बात आती है। क्या ? भगवान ने प्रतिज्ञा की - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि बालि को एक ही बाण से मारूँगा। सुग्रीव बड़े प्रसन्न हुए, पर भगवान ने बड़ी अनोखी लीला की। क्या ? सुग्रीव से कहा कि तुम गर्जना करके बालि को चुनौती दो और उससे युद्ध करो। सुग्रीव तो आश्चर्य से मुँह ताकने लगे। बोले कि महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु बोले कि मैं मारूँगा , लेकिन लड़ोगे तुम। यह तो बड़ी विचित्र बात है, पर यही तो दर्शन है। यह बड़े महत्व की बात है। जब भगवान ने प्रतिज्ञा की कि वे बालि को मारेंगे तो उन्हें चाहिए था कि वे स्वयं बालि को चुनौती देते, युद्ध करते और उसे मार डालते, पर भगवान कहते हैं कि लड़ना तो तुम्हें ही है और मारना मुझे है। यह सत्य केवल सुग्रीव के संदर्भ में नहीं, यह तो सबके जीवन का सत्य है। अभिप्राय यह है कि वास्तव में बालि के विजेता तो भगवान राम ही हैं, पर सुग्रीव उसके निमित्त बने। सुग्रीव इस दर्शन को स्वीकार कर लेते हैं। यह बोध ही भक्ति का स्वरूप है, जिसे भगवान सुग्रीव के जीवन में क्रमशः विकसित करते हैं।

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