Tuesday, 15 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने भगवान श्री राघवेन्द्र तथा विदेहनन्दिनी श्रीसीताजी के विवाह का बड़ा ही मधुर चित्र प्रस्तुत किया। किन्तु अनोखापन यह है कि उस वर्णन में वे अपनी लेखनी के माध्यम से एक ओर तो दिव्य रस की सृष्टि करते हैं, तथा दूसरी ओर वे उसमें अपनी दार्शनिक शैली को अवश्य जोड़ देते हैं। यह भगवान श्रीराम का विवाह जो त्रेतायुग का सत्य है, उसे हम केवल त्रेतायुग या भूतकाल के सत्य के रूप में ही देखने की चेष्टा न करें, अपितु प्रयत्न तो यह करना चाहिए कि भूतकाल का यह सत्य हमारे वर्तमान जीवन का सत्य बन जाय। त्रेतायुग में महाराज श्री जनक के मण्डप में संपन्न होने वाले उस विवाह की समग्र प्रक्रिया हमारे जीवन में ही संपन्न हो जाय। हम स्वयं जनक बन जायँ, सुनयना बन जायँ, अथवा जनकपुरवासिनी स्त्रियों में से कोई भावमयी स्त्री बनकर भगवान से नाता जोड़ सकें।
      गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।

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