मंथरा को श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार मिला। बुद्धि तो उलटी हुई ही है। अब उसकी वह उलटी बुद्धि बड़ी तीव्रता से सक्रिय हो गयी। उसमें बड़ा पैनापन आ गया। राम को राज्य मिलेगा। राम कितने प्रसन्न होंगे, कौसल्या कितनी प्रसन्न होगी। बस, ह्रदय जलने लगा। तब उसने सोचा कि नहीं, ऐसा नहीं होने दूँगी। राम का राज्याभिषेक नहीं होने दूँगी और वह ऐसा क्यों नहीं होने देना चाहती ? उसकी युक्ति और तर्क देखिए। बुद्धि जब विकृत होती है तो वह निष्क्रिय नहीं, बल्कि अधिक सक्रिय हो उठती है और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र, धर्म और ईश्वर सबका उपयोग कर लेती है। वह धर्म की एक नयी और अद्भुत व्याख्या कर लेती है। वह कहती है कि मैं रामराज्य में बाधा उपस्थित करके कोई अधर्म थोड़े ही कर रही हूँ। मैं तो अपने धर्म का पालन कर रही हूँ। मैं कैकेयी की दासी हूँ। सेवक का धर्म यही है कि वह स्वामी के हित की रक्षा करे। मेरे रहते मेरी स्वामिनि की इतनी उपेक्षा ? कैकेयी के पुत्र को छोड़कर कौसल्या के पुत्र को राज्य मिले, तो फिर मैं किस दिन काम आऊँगी ? महाराज ने तो मुझे भेजा ही इसलिए है कि विशेष रूप से मैं निरन्तर सजग रहकर कैकेयी के हितों की रक्षा करूँ। इसलिए मैं जो कुछ कर रही हूँ, वह धर्मसंगत और न्यायसंगत है।
No comments:
Post a Comment