Sunday, 6 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

मानस-रोग प्रसंग के प्रारंभ में ही एक सूत्र दिया गया है और वह यह है कि व्यक्ति के सामने अगर कोई सबसे बड़ी समस्या है तो वह सुख और दुःख की ही है। व्यक्ति सदा सुखी रहना चाहता है। वह समग्र सुख पाना चाहता है। वह चाहता है कि उसके जीवन में दुःख कभी न आये, पर ऐसी आकांक्षा होते हुए भी व्यक्ति के जीवन में अगणित दुःख आते रहते हैं। इन दुःखों का प्रमुख कारण क्या है ? गोस्वामीजी मनोरोगों को ही दुःखों का प्रमुख कारण बताते हैं। एक दुःख होता है वस्तु के अभाव में, जिसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। इस सत्य की स्वीकृति मानस में इन शब्दों में की गयी है - नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं। जहाँ तक व्यक्ति के जीवन में अभावजन्य दुःखों का प्रश्न है, व्यक्ति उन अभावों को दूर करके दुःख दूर करने का प्रयत्न कर सकता है, लेकिन मन तथा शरीर दोनों के संदर्भ में एक बात समान रूप से दिखाई देता है कि जब हम रूग्ण हो जाते हैं, तब हमारा रोग अभावजन्य नहीं रह जाता।
       .......आगे कल ........

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