किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि महाराज ! आप स्वर्ग की इतनी निन्दा क्यों करते हैं ? तो उन्होंने कहा कि स्वर्ग में सारे भोग तो मिल जाते हैं, पर एक समस्या वहाँ भी बनी रहती है। क्या ? स्वर्ग में भी सौतिया डाह नहीं मिटती। अपने अगल-बगल वालों को देखते हैं कि उसके पास कितनी अप्सराएँ और कितने भोग हैं। उसकी तुलना में हमारे पास कितना कम है तब दूसरों से ईर्ष्या होती है। लोभ में तो अपने ही सुख की लालसा है, पर दूसरों के सुख को देखकर जो हमारे अन्तःकरण में जलन हो रही है, इस दुःख का क्या इलाज है ? तब वह सुखी व्यक्ति को दुखी बनाने की चेष्टा करता है। यही क्रम मंथरा के जीवन में दिखाई देगा।
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