Monday, 21 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

बड़ी विलक्षण बात है। जब तक बालि विजेता रहा, तब तक वह सत्य से दूर रहा और जब उसके जीवन में पराजय हुई तब उस पराजय के क्षण में उसके समक्ष सत्य का, तत्वज्ञान का उदय हुआ। इस पूरे प्रसंग में बालि के चरित्र का क्रमिक विकास दिखाई देता है। यह ज्ञान का संदर्भ है। शरीर का परित्याग करते समय बालि को रंचमात्र भी दुःख नहीं होता। यह बालि के चरित्र का चरम विकास है, उसके जीवन की सर्वोत्कृष्ट परिणति है। कहीं तो वह रावण को पराजित करके उसे मित्र बना लेता है, कहीं दुन्दुभि को मारकर भी वह पुरस्कार के स्थान पर शाप पा लेता है। अनगिनत विजय प्राप्त करके उसके अभिमान की ही वृद्धि होती चली जाती है, यह है सत्कर्म के साथ जुड़ी हुई समस्या।  बालि सत्कर्म और पुण्य का प्रतीक है। सत्कर्म और पुण्य के साथ आने वाली समस्याओं को बालि के चरित्र के माध्यम से प्रकट किया गया है।

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