Thursday, 17 December 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

पूर्व विषय के आगे .....
गीधराज जटायु और रावण का युद्ध हुआ और उस युद्ध में ऐसा लगा जैसे रावण जीत गया और जटायु हार गये। रावण ने अपने कृपाण से उनके पंख काट दिये और वे पृथ्वी पर गिर पड़े, लेकिन कितनी विलक्षण बात है। जीता कौन और हारा कौन ? देखने में तो यही लगता है कि रावण जीत गया और गीधराज हार गये, किन्तु यदि अंतरंग में पैठकर देखें तो एक दूसरा ही सत्य सामने आता है। गीधराज गिरकर जमीन पर पड़े हैं। पक्षी का पंख कट जाना माने उसके जीवन में व्यर्थ हो जाना है, लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि यहाँ तो दूसरा दृश्य है। क्या ? कुछ देर बाद जटायु ने देखा कि भगवान राम चले आ रहे हैं। गदगद हो गये। सोचा कि चलो पंख कटना भी सार्थक हो गया। कैसे ? पंख होता तो मुझे उड़कर भगवान के पास जाना पड़ता। अब पंख नहीं हैं तो प्रभु स्वयं चलकर मेरे पास आ रहे हैं। पंख की सार्थकता अर्थात साधना की सार्थकता ईश्वर को पाने में है, पर जहाँ साधना और पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो गयी तो भगवान स्वयं कृपा करके आ गये।

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